5 ऐसी चूक जो घोटालेबाजों को देश छोड़ कर भागने की सहूलियत देती हैं

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आये दिन यह खबर अखबार में पड़ने या सुनने को मिलती है कि ये फर्म या ये कंपनी बैंक का या दुसरे शब्दों में आम जनता की कमाई का करोडो रुपया लेकर भाग गयी.  लेकिन ऐसी घटनाये होती ही क्यों है.  क्या ये सब पूर्व नियोजीत होता है, या परिस्थितिजन्य?. वास्तव में इसमे भी दोनों तरह की बाते होती है.

क्यों होते है ऐसे घोटाले

पहले प्रकार की यदि हम बात करे तो, ये वो लोग होते है जिनकी नियत में पहले से ही खोट होती है. सिस्टम की किसी ख़ामी को भापं कर ये घोटालेबाज जाल तैयार करते है. कृत्रिम परिस्थितियां उत्पन्न करते है. ताकि पहले लोगो का और सरकार का विश्वास जीते. और फिर जब लोग भरोसा करने लगते है, अपना ध्यान और नजरे जब उन पर से हटा देते है तब वे सिस्टम की खामियों का फायदा उठा कर अपना उल्लू सीधा कर लेते है और पैसा लेकर रफू चक्कर जो जाये.

दुसरा प्रकार उन लोगो का भी होता है.  जो शुरुआत तो अच्छी नीयत से ही करते है, पर चूंकि व्यापार में मुनाफे और लाभ का कोई 100 % अनुमान नहीं लगा सकता, कभी कभी परिस्थितियां विपरीत चली जाती है और व्यापार में नुकसान चला जाता है.  परिस्थितियां ऐसी बन जाती है की कंपनी या फर्म के लिये हाथ खड़े करने के अलावा कोई और रास्ता नहीं होता है, तब सम्बंधित व्यक्ति सोचता है की मै अपना भविष्य सिक्योर करूँ और भाग निकलूं और बहूत बार भाग निकलने में सफल भी हो जाते है. इस तरह से भी तैयार होते है घोटालेबाज.

उपरोक्त दोनों ही स्थितियां अपराध की ही श्रेणी में आती है.  किसी भी परिस्थिति में सरकार या जनता को धोखा देना अपराध की श्रेणी में आता है.

परंतू सोचने वाली जो बात है वो यह है कि प्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जनता का पैसा उन्हें किस तरह से एक्सेस होता है. और जनता के हित या अहित इस तरह की घटनाओ से कैसे जुड़े होते है. सीधी सी बात है कि कोई भी कंपनी या फर्म व्यापर के लिए या तो बैंक से (बैंक में जनता ही का जमा पैसा होता है) या दुसरा शेयर मार्केट के माध्यम से जनता का पैसा एक्सेस करती है, व्यापार में अपने उपयोग के लिये. पर दोनों ही मामलो में सरकार ने जनता के पैसो की सुरक्षा के लिये कानूनी प्रावधान किये हुए है.

शेयर मार्केट से संबंधीत ग्राहकों के हितों को सेबी सुनिश्चित करता है. इसी तरह से बैंक में जनता का जमा पैसा सुरक्षित रहे इसके लिये आरबीआई ने लोन देने के सम्बन्ध में बैंक्स के लिये कड़े दिशा निर्देश दिए हुए है की फर्म या कंपनी जो लोन ले रही हैं, की दिवालिया होने की स्थिति में भी जनता का पैसा सुरिक्षत रह सके. इसके लिये लोन देते वक्त बैंक ने मार्जिनमनी और कोलैटरल डिपाजिट जमा करवाने का नियम बना रखा है.

इसलिये यदि कंपनी या फर्म व्यापार में दिवालिया हो जाती है या किन्ही भी कारणों से लोन की रकम को जमा नहीं कराते है तो भी बैंक के पास सिक्यूरिटी के रूप में पर्याप्त पैसा हो. जिससे की जनता के पैसो की समुचित भरपाई हो सके.

अगर सिस्टम की बात करे तो सरकार पर्याप्त प्रावधान व्यवस्था या सिस्टम में करती है की कोई बैंक सरकार या जनता के पैसो को चूना लगा कर भाग नहीं सके.

क्यों होती है ऐसी घटनाये, वे कौन से कारण है जो घोटालेबाजो को देश छोड़ कर भागने में मदद करते है.

भ्रष्टाचार

अभी हाल में हुए हीरे व्यापारी नीरव मोदी के मामले में पंजाब नेशनल बैंक के अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे है.  इसका मतलब बैंक सिस्टम से सम्बंधित कई ऐसे लोग रहे होंगे जिन्होने इस काण्ड को सफल बनाने में अपनी भूमिकाए निभाई.  बिना लालच इन लोगो ने मदद की होगी ऐसा नहीं लगता.  इसलिये ये मना जा सकता है कि, बैंक के अधिकारियों में व्याप्त भ्रष्टाचार इसके लिये जिम्मेदार है. उन्ही की नीयत की वजह से घोटालेबाज देश से बहार भाग पाते है.

नैतिक मूल्यों में  कमीयां

जाँच एजेंसीस ने उपरोक्त मामले में हनीट्रैप के षड्यंत्र की भी सम्भावनाये जताई है, सीधे तौर पर कुछ बैंक अधीकरियो के चरित्र पर ये सवालिया निशान लगाता है.

कर्तव्य बोध की कमी

ऐसा संभव नहीं है की सारे बैंक अधिकारी एवं कर्मचारी भ्रष्ट हो या उनमे नैतिक मूल्यों की कमी हो, फिर भी इस तरह के काण्ड सफल क्यों हो पाते है.  इसका कारण वास्तव में कर्त्तव्य बोध की कमी भी है, कई लोग नेटवर्क में ऐसे होते है जिन्हें षड्यंत्रों की जानकारी प्राप्त तो हो जाती है लेकीन वे उसे सामने लाने की कोशिश नहीं करते है, क्योंकी मामले से उनके सीधे हित या अहित नहीं जुड़े होते है.

ये कर्त्तव्य बोध की कमी की वजह से होता है. इन बातों का एहसास सरकारी कर्मचारीयों को होना चाहीये. उन्हें समझना चाहिए की उन का सीधा नुकसान नहीं हो रहा है तो क्या हूआ पर उन्हें यह सोचना चाहिये की जिस नाव में वे बैठे है उसमे यही कोई छेद कर रहा है तो देर सबेर नाव के साथ उनको भी डूबना है या दुसरे शब्दों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष नुकसान उठाना ही है. कर्मचारीयों को यह समझना जरूरी है की देश का नुकसान या संस्था का नुकसान जिसमे वे काम कर रहे है होने पर देर सबेर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उनका नुकसान भी होना तय है. अगर ये समाज आ जाए तो घोटालेबाज देश से भागने में सफल ना हो.

आलस्य

बहूत बार सिस्टम में ऐसी तकनीकी कमिया देखी जाती है, जो समय रहते नही सुधारी जाती, टाली जाती है और कमियां ठीक करने से पहले ही घोटालेबाज काण्ड करने में सफल हो जाते है.

कानून संबंधीत कमियां:

नीरव मोदी के मामले में यह सामने आया था की एक वर्ष पूर्व उसने अपनी नागरिकता के स्टेटस में परीवर्तन कर लिया था.  लोन लेते वक्त एलओयू जारी करते वक्त तो पहचान संबंधीत जानकारीयों के प्रमाणीकरण का प्रावधान है, पर कोई बाद में इनमे परिवर्तन कर लेता है तो क्या त्वरीत एक्शन लिया जा सके इसमे कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है.  नीरव मोदी ने एक साल पहले ही अपनी राष्ट्रीयता के स्टेटस में परिवर्तन करा लिया था लेकीन कोई स्पष्ट दीशानिर्देश नहीं होने की वजह से या इस बात से अवगत नहीं हो पाने की वजह से वो लगातार बैंक्स से सम्बन्ध बनाये रहा और घोटाले करता रहा और साथ साथ उसने भागने के रास्ते भी तैयार कर लिये थे.

अत: इन सभी मामलो से सबक लेते हुए सरकार के स्तर पर एवं लोगो को अपने स्तर पर खामियां पहचानते हुए उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहीये.

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