अक्षय तृतीया: जैन धर्म के अनुसार क्या करना चाहिए और क्या नहीं

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अक्षय तृतीया: जैन धर्म के अनुसार क्या करना चाहिए और क्या नहीं
अक्षय तृतीया: जैन धर्म के अनुसार क्या करना चाहिए और क्या नहीं

अक्षय तृतीया धार्मिक कर्तव्य

वैशाख शुक्ल 3

श्री वृषभदेव भगवान को जब जीवन से वैराग्य हो गया तो उन्होंने जैन धर्म की दीक्षा ली तथा 6 महीने का उपवास लेकर तपस्या की. 6 माह बाद जब उनकी तपस्या पूरी हुई तो वे आहार के लिए निकले. जैन दर्शन में श्रावकों द्वारा मुनियों को आहार का दान किया जाता है. लेकिन उस समय किसी को भी आहार की चर्या का ज्ञान नहीं था. जिसके कारण उन्हें और 6 महीने तक निराहार रहना पड़ा. बैसाख शुल्क तीज (अक्षय तृतीया) के दिन श्री वृषभदेव भगवान जब विहार (भ्रमण) करते हुए हस्तिनापुर पहुंचे.

वहां भगवान के रूप को देखते ही राजकुमार श्रेयांस को अपने कई भवों का जातिस्मरण हो आया जिसमें उन्हें अपने पिछले भव के मुनि को आहार देने की चर्या का स्मरण हो गया. तत्पश्चात हस्तिनापुर पहुंचे श्री वृषभदेव भगवान को राजकुमार श्रेयांश, राजा सोम एवं रानी लक्ष्मीमति ने प्रथम आहार इक्षु रस (गन्ने/पौंडा का रस) का दिया. जैन दर्शन में अक्षय तृतीया का बहुत बड़ा महत्व है और जैन श्रावक इस दिन इक्षु रस का दान करते हैं.

उपरोक्त कहानी से 2 तथ्य सामने आते हैं.

  • अक्षय तृतीया यह आहार दान का पर्व है.
  • श्री वृषभदेव भगवान ने प्रथम आहार इक्षु रस का लिया था.

उपरोक्त 2 तथ्यों के विरुद्ध आज समाज में रुढ़ीयां चल रही हैं.

आहार आदि दान की जगह जैन समाज के लोग अन्य सम्प्रदाय के लोगों को देख कर अक्षय तृतीया के दिन सोना, चांदी, हीरे, आदि से बने आभूषण अथवा अन्य वस्तुएं खरीदने लगे हैं और सोचते हैं कि ऐसा करने से लक्ष्मी देवी का उनके घर में वास हो जाएगा. लेकिन वो श्रावक केवल लोक मूढ़ता में फसकर अक्षय तृतीया के आहार दान आदि दान के महत्त्व को भूल गए हैं. अक्षय तृतीया यह त्याग का पर्व है और श्रावकों ने इस दिन को परिग्रह जोड़ने का पर्व बना डाला है. परिग्रह जोड़ने से पाप का ही बंध होता है और दान से पुण्य का बंध होता है.

धार्मिक कर्तव्य

  • अक्षय तृतीया पर अपने गांव / शहर में कोई निर्ग्रन्थ मुनि, आर्यिका माताजी, ऐलक, क्षुल्लक, क्षुल्लिका अथवा अन्य प्रतिमाधारी श्रावक हो तो सर्वप्रथम उनको आहार दान दें. आहार दान में इक्षु रस का दान अवश्य करें. यदि आपके गांव / शहर में कोई पात्र न हो तो मंदिर, गौशाला, आदि में दान करें. इससे सातिशय पुण्य का संचय होगा.
  • अक्षय तृतीया के दिन श्री वृषभदेव भगवान ने प्रथम आहार इक्षु रस का लिया था. अब कुछ लोगों ने आहार के द्रव्य “इक्षु रस” को अभिषेक का विषय ही बना डाला है. लोग यह बात क्यों नहीं समझते कि अक्षय तृतीया के दिन भगवान ने इक्षु रस का आहार किया था उस इक्षु रस से स्नान नहीं किया था. फिर भी कुछ पंथवादी लोग इस दिन मंदिरों में इक्षु रस से भगवान का अभिषेक कर देतें हैं.

जैन धर्म का मूल प्राण ‘अहिंसा’ ही है और जहां हिंसा होगी वहां धर्म कैसे हो सकता है.

क्यों न करें इक्षु रस से अभिषेक इसके 2 कारण है.

  1. इक्षु रस से अभिषेक करने पर उसकी छींटे मूर्ति के और गर्भगृह के चारों ओर फैल जाती हैं और गर्मी का मौसम होने से चींटियों की प्रचुर मात्रा सभी जगह होने से इस फैले हुए इक्षु रस पर हजारों चींटियां आ जाती है. बाद मे श्रावक जब मूर्ति और गर्भगृह को धोते हैं तो इन हजारों चींटियों की हिंसा होती है. कभी कभी तो सफाई भी ठीक से नहीं होती तो अनेक दिनों तक चींटियां आती रहती है और श्रावकों के पैरों के नीचे दबकर उनकी हिंसा होती रहती है. ऐसी घटना मांगीतुंगी में वृषभदेव भगवान की 108 फुट ऊंची प्रतिमा के अभिषेक के वक़्त हुई थी जब हवा से इक्षु रस सब ओर फैल गया और उसपर हजारों चींटियां आ गई और श्रावकों के पैरों के नीचे दबकर वहां काफी हिंसा हुई.
  2. इक्षु रस निकालते समय गन्ना ठीक से धो कर उसका रस निकाला है या गंदे मक्खियों के मल से आच्छादित गन्ने के मल पूर्ण रस से अभिषेक कर दिया है हर बार इसका ध्यान कौन रखता है. ऐसे मक्खियों के मल, मूत्र आदि से मिले हुए गन्ने के रस से भगवान का अभिषेक करना उचित है क्या? क्या ये भगवान की अविनय और अशुद्धि नहीं है? खाने की चीजों से अभिषेक करना सर्वथा अनुचित है?

साधुओं को भी आहार देते समय शुद्धिपूर्वक गन्ने का रस निकालने का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए गन्ना पूर्ण छीलकर फिर उसे प्रासुक जल से धोकर उसके उपरांत ही रस निकालकर और उसे प्रासुक करके ही साधुओं को दें.

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