पग-पग पर बिछे बमों के जाल को ढूंढकर अफसरों-जवानों की जान बचाने वाली और कोंडापारा कैंप खोलने और आईईडी को ढूंढने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली सीआरपीएफ 111वीं बटालियन के स्निफर डॉग बैरी नैना की जगदलपुर में ट्रेनिंग के दौरान मौत हो गई। इसके बाद जगदलपुर में ही मंगलवार को पोस्टमार्टम के बाद स्निफर डॉग को पूरे राजकीय सम्मान के साथ उसे अंतिम विदाई दी गई। बैरी को विदाई देते वक्त टूआईसी कुंवर सिंह,सहित अन्य अफसरों और जवान मौजूद रहे। डीआईजी के मुताबिक फोर्स में स्निफर डाॅग की सबसे बड़ी भूमिका होती है। बिल्कुल अफसर और जवान की तरह अपनी भूमिका निभाते हैं। बैरी काफी तेज थी,कई बार अफसरों और जवानों को ब्लास्ट की चपेट में आकर नुकसान होने से उसने बचाया है।

पग-पग पर बिछे बमों के जाल को ढूंढकर अफसरों-जवानों की जान बचाने वाली

बटालियन के हेडक्वार्टर में ही हुआ था जन्म

– सीआरपीएफ 111वीं बटालियन के कारली के पास हेडक्वार्टर में ही लैब्रो ब्रीड की बैरी नैना का साल 2011 में जन्म हुआ था। बटालियन के प्रभारी कमांडेंट के मुताबिक, बैरी काफी चुलबुली थी। कैंप के हर एक जवान की लाड़ली थी। आॅपरेशन्स के दौरान बहुत ही सतर्कता के साथ वह काम करती थी। डाॅग को समय-समय पर ट्रेनिंग दी जाती है।

सीआरपीएफ की बटालियन में तैनात हैं 7 डाॅग

– सीआरपीएफ की सभी बटालियन में सात कंपनियां हैं। ऐसे में सभी बटालियन की कंपनियों में एक-एक डाॅग तैनात हैं। नक्सल प्रभावित इलाका होने के कारण यहां वे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। डेढ़ साल पहले सातधार में ब्लास्ट के बाद आसपास के इलाकों की अफसर सर्चिंग कर रहे थे। 195 वीं बटालियन में तैनात डाॅग का पैर बम पर जाते ही ब्लास्ट हुआ और वह उछल गई। हालांकि इसमें कोई हताहत नहीं हुआ था।

अरनपुर में तीन सालों तक थी तैनात

– समेली, अरनपुर जैसे नक्सल प्रभावित इलाके में बैरी तीन सालों तक तैनात थी। अरनपुर से जगरगुंडा सड़क निर्माण के वक्त कोंडापारा कैंप खोला जाना था, जहां डाॅग हैंडलर के साथ वह सबसे आगे चलती थी।

– अरनपुर से कोंडापारा के बीच तीन सालों तक सतर्कता के साथ काम किया। इस रोड पर 10 से ज्यादा आईईडी बरामद कराने में महत्वपूर्ण योगदान देकर जवानों को क्षति होने से बचाने का काम किया है। सड़क निर्माण के दौरान वह जवानों के साथ सुरक्षा के लिए दिन भर तैनात रहती थी।

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