कांग्रेस ने खेले 5 बड़े दाव-क्या मिल पायेंगी कर्नाटक की गद्दी ?2014 के आम चुनाव के बाद कांग्रेस एक के बाद एक राज्य के चुनाव हार रही है. अब उसका एक और राज्य दांव पर है. कर्नाटक में आगामी महीनों में विधानसभा चुनाव होने हैं, ऐसे में कांग्रेस इस राज्य को किसी भी हालत में अपने हाथ से नहीं जाने देना चाहती है, वहीं दूसरी तरफ बीजेपी 5 साल बाद फिर से राज्य में अपनी वापसी को लेकर आश्वस्त है. क्या ये दोहराया जाएगा या नहीं?.

राज्य की सिद्धारमैया सरकार चुनाव से पहले हर हथकंडा आजमाकर अपना वोट बैंक मजबूत करने में लगी हुई है. राज्य का अलग झंडा, लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देना आदि ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन्हें सिद्धारमैया सरकार चुनाव से पहले उठाकर एक खास वर्ग को अपनी ओर आकर्षित करने में लगी हुई है. वहीं दूसरी तरफ बीजेपी के लिए इन मुद्दों की काट खोज पाना आसान नहीं हो पा रहा है. बीजेपी राज्य की कांग्रेस सरकार के इन फैसलों को विभाजनकारी कहकर अपना विरोध दर्ज कराने में लगी हुई है.

यहां हम कांग्रेस के उन बड़े दांव-पेंचों की  बात करेंगे:-

  1.  लिंगायतों को अलग धर्म का दर्जा:-

विधानसभा चुनाव से पहले राज्य मंत्रिमंडल ने हिंदू धर्म के लिंगायत पंथ को एक अलग धर्म के रूप में मान्यता देने पर सहमति जताई है. क्या ऐसा हो पाएगा या नहीं ?. राज्य मंत्रिमंडल ने सर्वसम्मति से लिंगायत और वीरशैव लिंगायत को धार्मिक अल्पसंख्यक का दर्जा देने का फैसला किया है. लिंगायत और वीरशैव लिंगायत दक्षिण भारत में सबसे बड़ा समुदाय हैं, जिनकी आबादी यहां कुल 17 प्रतिशत है.

परंपरागत तौर पर इस समुदाय को बीजेपी का वोट बैंक माना जाता है, ऐसे में सिद्धारमैया का ये दांव ट्रंप कार्ड साबित हो सकता है. हालांकि अभी उसे इसके लिए केंद्र सरकार की मंजूरी चाहिए. ऐसे में बीजेपी के लिए मुश्किलें कम नहीं हैं. भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार बी.एस. येदियुरप्पा लिंगायत समुदाय के हैं, जिनका इस समुदाय में काफी प्रभाव माना जाता है. बीजेपी का विरोध लिंगायत की नाराजगी की वजह बन सकता है.

  1. राज्य का अलग झंडा:-

चुनाव पूर्व कर्नाटक सरकार ने राज्य के झंडे को भी स्वीकृति दे दी है. 9 सदस्यीय समिति ने झंडे में ऊपर पीली बीच में सफेद और नीचे लाल रंग की पट्टी की सिफारिश की थी. बीच में सफेद पट्टी पर राज्य का आधिकारिक चिन्ह है. राज्य के अलग झंडे के लिए भी केंद्र सरकार की अनुमति की आवश्यकता है. इस मुद्दे पर भी कांग्रेस सरकार ने गेंद केंद्र यानी बीजेपी के पाले में डाल दी है. भारत में जम्मू-कश्मीर राज्य के अलावा किसी अन्य के पास अपना झंडा नहीं है. जम्मू-कश्मीर में धारा 370 के तहत अलग झंडा है.

3. कावेरी पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पक्ष में आया :- चुनाव से पहले कावेरी जल विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी सिद्धारमैया के पक्ष में रहा. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर सिद्धारमैया ने संतोष जताया. इस विवाद में राज्य के पक्ष में फैसला आया और कावेरी नदी से मिलने वाले जल की हिस्सेदारी राज्य सरकार को अधिक मिलना भी सिद्धारमैया सरकार के लिए संतोषजनक रहा. जिसमें पानी के उद्देश्य से बैंगलोर को अधिक पानी आवंटित करने का फैसला भी शामिल है.

क्षेत्रीयता को कैसे मिलेगा बढ़ावा?

4. क्षेत्रीयता को बढ़ावा:- दक्षिण भारत में अक्सर क्षेत्रीयता को बढ़ावा दिया जाता है, इसलिए भाषा बहुत बड़ा मुद्दा होता है. केंद्र सरकार को हिंदी बढ़ावा देने के उलटे सिद्धारमैया सरकार ने नए-ने मेट्रो स्टेशन पर हिंदी के पोस्टर को हटवा दिया. कर्नाटक  में कन्नड़ को बढ़ावा देने की वजह से कई शख्त कदम उठाए.

कर्मचारियों के वेतन:-

5. बजट में बड़ी-बड़ी घोषणाएं और किये गए वादे:- सिद्धारमैया सरकार ने बजट से पहले 6वी बजट पेश की. इस बजट के माध्यम से भी राज्य की कांग्रेस सरकार ने लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए बजट में कई लुभावने घोषणाएं की. राज्य में 6वे वेतन आयोग को पारित करने के लिए राज्य सरकार ने 5.93 लाख कर्मचारियों और 5.73 लाख पेंशन धारकों 10,508 करोड़ खर्च करेगी. कर्मचारियों के वेतन में 30% की वृधि की सिफारिश की गई है.

सिद्धारमैया सरकार ने मुख्यमंत्री अनिल भाग्य योजना की सिफारिश की है, जिसके तहत दो चूल्हे वाला गैस  स्टोव और दो गैस सिलेंडर निःशुल्क उपलब्ध कराई जाएगी. किसानों की मदद के लिए रैयत बेलाकू योजना की भी घोषणा की है जिसमें वर्षा पर निर्भर खेती करने वाले प्रत्येक किसान को अधिकतम 10,000 रुपए और न्यूनतम 5,000 रुपए प्रति हेक्टेयर के हिसाब से राशि की सहायता सीधे उनके बैंक खातों में डाली जाएगी.

प्रमुख बिंदु :-

  • सिद्धारमैया ने कन्नड़ को दिया बढ़ावा.
  • राज्य का अलग झंडा.

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