गणगौर सनातन (हिन्दू) धर्म का एक महत्वपूर्ण और प्राचीन त्यौहार है, जो विशेषकर या यूँ कहिए की केवल महिलाओं का त्यौहार है. इसे बड़े हर्ष और उल्लास के साथ सम्पूर्ण भारत देश में मनाया जाता है. तो आइये आज जानते हैं इस त्यौहार की उत्पत्ति का कारण, कहाँ से यह त्यौहार पृथ्वी पर शुरू हुआ और कौन से देवों ने इसकी शुरुवात की.

गणगौर पूजन की उत्पत्ति की कथा

एक बार शिव पार्वती जी और नंदी भ्रमण के लिए पृथ्वी पर आते हैं. भ्रमण के दौरान पार्वती जी को प्यास लगती है, और वो एक नदी से पानी पीने के लिए रुक जाती हैं. जैंसे ही माता पानी पीने के लिए अंजलि बनाती हैं, बार बार उनके हाथ में बेलपत्री धतुरा और फूल आ जाते हैं, तो पार्वती जी शिव जी से पूंछती है की भगवन ऐसा क्यों हो रहा है? उनके प्रश्न पर शिव जी कहते हैं की देवी आज आप कुछ भूल रहीं हैं, ये सुनकर माता पार्वती शिव जी से प्रार्थना करती है की हे स्वामी! बताइए क्या भूल रही हूँ मैं?

फिर शिव जी माता पार्वती को याद दिलाते हैं की आज गणगौर है.

विधि और फल

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याद आते ही माता पार्वती गणगौर वृत की पूजन का संकल्प धारण करती हैं, और पृथ्वी लोक में ही पूजन करने का निश्चय कर लेती हैं. भ्रमण करते हुए उन्हें एक सुन्दर सा गांव दिखाई देता है, तो एक उचित स्थान देख कर वहीँ पूजन की तैयारी करने लगती हैं. और नंदी जी को गांव की महिलाओं को पूजन में सम्मिलित होने के लिए बुलावा देने भेज देती हैं.

गांव में जैंसे ही खबर लगती है की माता पार्वती स्वयं गणगौर वृत का पूजन करने पृथ्वी पर पधारी हैं, तो जो निम्न वर्ग की महिलाएं थीं ये बुलावा सुनकर तुरंत पूजन के लिए पहुँच जाती हैं, वहीँ उच्च वर्ग की महिलाएं साज सज्जा और पूजन सामग्री की व्यवस्था के कारण देर कर देती है.

इस बीच माता पार्वती पूजन में लगने वाला सुहाग, जो की बेलपत्री, पलाश के फूल, सिन्दूर मिलाकर लाल रंग का एक द्रव्य होता है, तैयार कर लेती हैं. जब ये निम्न वर्ग की महिलाएं जो पहले पहुँच जाती हैं, माता के समक्ष हाथ जोड़ कर बैठ जाती हैं तो माँ उनके ऊपर बड़े ही स्नेह से आशीर्वाद स्वरुप यह सुहाग नामक द्रव्य, अपने हाथों से उनके ऊपर छिड़क देती हैं, और सभी महिलाऐं माता के इस आशीर्वाद को सौभाग्य के रूप में ख़ुशी ख़ुशी धारण कर लेती हैं.

इसके बाद जब उच्च वर्ग की महिलाएं माता के समक्ष पूजन करने आती हैं तो सुहाग द्रव्य समाप्त हो चुका होता है, तो इन महिलाओं को भी आशीर्वाद देने के लिए माँ पार्वती अपनी अनामिका ऊँगली को काट कर अपने रक्त को ही सुहाग रूप में उन सभी के ऊपर छिड़क देती हैं.

लेकिन रक्त तो सिमित मात्र में ही निकलता है, और इस कारण वो अपर्याप्त हो जाता है, जिससे उच्च वर्ग की महिलाओं को सुहाग बहुत मात्र में नही मिल पाता.

कथा का सारांश

जिसका अर्थ और फल ये है की निम्न वर्ग की महिलाओं को भरपूर सुहाग द्रव्य धारण करने मिला जिसका फल यह हुआ की उनका दाम्पत्य जीवन उच्च वर्ग की महिलाओं की अपेक्षा अधिक लम्बे समय तक चलता है. मतलब महिलाओं के साथ उनके पति भी अधिक समय तक जीवित रहते हैं.

गणगौर पूजन में हवन और होम का निषेध क्यों?

माता पार्वती ने अपनी अनामिका ऊँगली काट कर सुहाग रूप में रक्त निकाला था, इसीलिए उनकी अनामिका ऊँगली काटने से जो पीड़ा हुई उसके लिए श्रद्धा भाव स्वरुप इस पूजन में होम मतलब हवन का निषेध है, क्योंकि हवन में अनामिका ऊँगली से ही आहुति दी जाती है.

इस दिव्य वृत के प्रति सम्पूर्ण श्रद्धा समर्पित करते हुए मैं कामना करती हूँ की माता पार्वती सहित गणगौर वृत की असीम कृपा आप सभी पर बनी रहे.

जय भवानी!

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