सिर्फ जीत के साथ मैंदान से निकलना बहादुरी नहीं होगी, लड़ाई के भले ही कोई नियम आप माने न माने लेकिन जीत के नियम आपको जरुर आने चाहिए. आप कितने भी शक्तिशाली हों, लेकिन टकराव के समय यदि आपने जीत के लिए तय सीमाओं और मर्यादाओं का अनुशरण करना चाहिए. नहीं तो आपकी जीत हो कर भी कहीं बाकी रह जाएगी. और हारने वाला इस बाकी रही जीत को आपसे छीन लेगा. इसलिए लड़ाई के नियम एक जैंसे हो सकते हैं, लेकिन जीत के नियम हर लड़ाई के लिए बदल जाते हैं.

 

 

कोई हारा हुआ आपको नज़र आता है तो उसका उपहास नहीं करना चाहिए. क्योंकि संभव है कि जो हार आपको दिख रही है उसके पीछे के कारण आपको नहीं दिख रहे हों. हार जीत लड़ाई पर नहीं जीत की कीमत पर निर्भर करती है, जीत किसके लिए क्या मायने रखती है. यही एक आधार होता है किसी की हार और जीत के बीच के फर्क का.

आज जो आपको हारा हुआ दिख रहा है हो सकता है वो अपनी जीत किसी को उपहार में दे कर आया हो. हो सकता है उसे एहसास हो गया हो की ये जीत सामने वाले के लिए ज्यादा जरुरी हो. और ऐसा बिलकुल मत मानिये की ये सोचने वाले अब इस दुनियाँ में नहीं हैं. वो हैं और हमेशा रहेगें.

 

जब आप किसी मैदान में उतरते हैं तो डर होता है, कुछ खो देने का या वो न पाने का जिसके लिए मैदान में उतरे हैं. और इस समय आपको सिर्फ एक बात सोचना चाहिए की इस लड़ाई में सबसे बुरा क्या हो सकता है? यदि आपने इसे समझ लिया की सबसे बुरा क्या होगा तो आपको अपनी जीत की तस्वीर नज़र आने लगेगी, क्योंकि हार का चेहरा आप तो सोच ही चुके हैं.

 

 

 

 

आप किसी को हरा सकते हो, लेकिन सिर्फ उसको, उसकी हिम्मत को नहीं. जो हथियारों से लड़ता है उसको आप कई बार हरा सकते हो, लेकिन जो हिम्मत से लड़ता है उसे आप मार तो सकते हो हरा नहीं सकते. हिम्मत हमेशा से एक अजेय हथियार रहा है हर एक योद्धा के लिए चाहे वो कोई वीर हो या वीरांगना. हमारे और दुनियाँ के हर देश के इतिहास के कई पन्ने ऐसी वीरगाथाओं से सुसज्जित हैं, जहाँ कई वीरों की यही कहानी रही है. जिसमे वो अपना सब कुछ हार गए, पर खुद को नहीं हारे.

 

 

हार यो या जीत उसके बाद क्या?

हार जीत जीवन नहीं बल्कि जीवन के भाग के भी प्रभाग हैं. यहीं सब कुछ ख़त्म नहीं होना, और इस हार या जीत के बाद तुरंत आपके सामने दूसरी लड़ाई खड़ी होगी. क्योंकि मानव जीवन केवल संघर्ष के लिए ही रचा गया है. जिसमे वो कभी दूसरों के कभी खुद के व्यव्हार से निकलने वाले परिणामों से टकराता रहता है. और इन परिणामों से ही उसका असली चरित्र निर्धारित होता है. आपमें जीतने की कितनी क्षमताएं हैं इससे बहुत अधिक फर्क नहीं पड़ता, बल्कि आप में जीत या हार को सहन करने की कितनी शक्ति है. इसी सहन शक्ति से आपका वो व्यव्हार सामने आएगा जो दूसरों की नज़र में आपको हार या जीत का असली हकदार बनाएगा.

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