हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 3

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हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 3
हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 3
  1. विद्यारंभ संस्कार :-

    हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 3
    हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 3

जब बालक/ बालिका की आयु शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाय, तब उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है. इसमें समारोह के माध्यम से जहाँ एक ओर बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा किया जाता है, वही अभिभावकों, शिक्षकों को भी उनके इस पवित्र और महान दायित्व के प्रति जागरूक कराया जाता है कि बालक को अक्षर ज्ञान, विषयों के ज्ञान के साथ श्रेष्ठ जीवन के सूत्रों का भी बोध और अभ्यास कराते रहें है.

  1. कर्णवेध संस्कार :-

हमारे मनीषियों ने सभी संस्कारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने के बाद ही प्रारम्भ किया है. कर्णवेध संस्कार का आधार बिल्कुल वैज्ञानिक है. बालक की शारीरिक व्याधि से रक्षा ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है. प्रकृति प्रदत्त इस शरीर के सारे अंग महत्वपूर्ण हैं. कान हमारे श्रवण द्वार हैं. कर्ण वेधन से व्याधियां दूर होती हैं तथा श्रवण शक्ति भी बढ़ती है. इसके साथ ही कानों में आभूषण हमारे सौन्दर्य बोध का परिचायक भी है. यज्ञोपवीत के पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार शुक्ल पक्ष के शुभ मुहूर्त में इस संस्कार का सम्पादन श्रेयस्कर है.

  1. यज्ञोपवीत/उपनयन संस्कार :-

यज्ञोपवीत (संस्कृत संधि विच्छेद= यज्ञ+उपवीत) शब्द के दो अर्थ हैं-उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है. मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं. सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है. यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया उपवीत, यज्ञसूत्र है.

यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है. इसमें सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं. ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है. तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है. तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं. अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है. बिना यज्ञोपवीत धारण कये अन्न जल गृहण नहीं किया जाता. यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है

यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

  1. वेदारम्भ संस्कार :-

यज्ञोपवीत (संस्कृत संधि विच्छेद= यज्ञ+उपवीत) शब्द के दो अर्थ हैं-उपनयन संस्कार जिसमें जनेऊ पहना जाता है. मुंडन और पवित्र जल में स्नान भी इस संस्कार के अंग होते हैं. सूत से बना वह पवित्र धागा जिसे यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति बाएँ कंधे के ऊपर तथा दाईं भुजा के नीचे पहनता है. यज्ञ द्वारा संस्कार किया गया उपवीत, यज्ञसूत्र.

यज्ञोपवीत एक विशिष्ट सूत्र को विशेष विधि से ग्रन्थित करके बनाया जाता है. इसमें सात ग्रन्थियां लगायी जाती हैं. ब्राम्हणों के यज्ञोपवीत में ब्रह्मग्रंथि होती है. तीन सूत्रों वाले इस यज्ञोपवीत को गुरु दीक्षा के बाद हमेशा धारण किया जाता है. तीन सूत्र हिंदू त्रिमूर्ति ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक होते हैं. अपवित्र होने पर यज्ञोपवीत बदल लिया जाता है. बिना यज्ञोपवीत धारण कये अन्न जल गृहण नहीं किया जाता बल्कि यज्ञोपवीत धारण करने का मन्त्र है वो इस प्रकार है :- यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं प्रजापतेर्यत्सहजं पुरस्तात् ।आयुष्यमग्रं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः।।

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