हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 2

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हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 2
हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 2
  1. नामकरण संस्कार :-

    हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 2
    हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 2

नामकरण शिशु जन्म के बाद पहला संस्कार कहा जा सकता है . यों तो जन्म के तुरन्त बाद ही जातकर्म संस्कार का विधान है, किन्तु वर्तमान परिस्थितियों में वह व्यवहार में नहीं दीखता. अपनी पद्धति में उसके तत्त्व को भी नामकरण के साथ समाहित कर लिया गया है. इस संस्कार के माध्यम से शिशु रूप में अवतरित जीवात्मा को कल्याणकारी यज्ञीय वातावरण का लाभ पहुँचाने का सत्प्रयास किया जाता है.

जीव के पूर्व संचित संस्कारों में जो हीन हों, उनसे मुक्त कराना, जो श्रेष्ठ हों, उनका आभार मानना-अभीष्ट होता है. नामकरण संस्कार के समय शिशु के अन्दर मौलिक कल्याणकारी प्रवृत्तियों, आकांक्षाओं के स्थापन, जागरण के सूत्रों पर विचार करते हुए उनके अनुरूप वातावरण बनाना चाहिए. शिशु कन्या है या पुत्र, इसके भेदभाव को स्थान नहीं देना चाहिए. भारतीय संस्कृति में कहीं भी इस प्रकार का भेद नहीं है.

शीलवती कन्या को दस पुत्रों के बराबर कहा गया है. ‘दश पुत्र-समा कन्या यस्य शीलवती सुता. ‘ इसके विपरीत पुत्र भी कुल धर्म को नष्ट करने वाला हो सकता है. ‘जिमि कपूत के ऊपजे कुल सद्धर्म नसाहिं ।’ इसलिए पुत्र या कन्या जो भी हो, उसके भीतर के अवांछनीय संस्कारों का निवारण करके श्रेष्ठतम की दिशा में प्रवाह पैदा करने की दृष्टि से नामकरण संस्कार कराया जाना चाहिए.

यह संस्कार कराते समय शिशु के अभिभावकों और उपस्थित व्यक्तियों के मन में शिशु को जन्म देने के अतिरिक्त उन्हें श्रेष्ठ व्यक्तित्व सम्पन्न बनाने के महत्त्व का बोध होता है. भाव भरे वातावरण में प्राप्त सूत्रों को क्रियान्वित करने का उत्साह जागता है. आमतौर से यह संस्कार जन्म के दसवें दिन किया जाता है. उस दिन जन्म सूतिका का निवारण-शुद्धिकरण भी किया जाता है. यह प्रसूति कार्य घर में ही

  1. निष्क्रमण् संस्कार:-

निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना. इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है. भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है. इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी.

उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है. जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है. तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए. इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो.

  1. अन्नप्राशन संस्कार :-

बालक को जब पेय पदार्थ, दूध आदि के अतिरिक्त अन्न देना प्रारम्भ किया जाता है, तो वह शुभारम्भ यज्ञीय वातावरण युक्त धर्मानुष्ठान के रूप में होता है. इसी प्रक्रिया को अन्नप्राशन संस्कार कहा जाता है. बालक को दाँत निकल आने पर उसे पेय के अतिरिक्त खाद्य दिये जाने की पात्रता का संकेत है. तदनुसार अन्नप्राशन 6 माह की आयु के आस-पास कराया जाता है. अन्न का शरीर से गहरा सम्बन्ध है. मनुष्यों और प्राणियों का अधिकांश समय साधन-आहार व्यवस्था में जाता है. उसका उचित महत्त्व समझकर उसे सुसंस्कार युक्त बनाकर लेने का प्रयास करना उचित है. अन्नप्राशन संस्कार में भी यही होता है.

अच्छे प्रारम्भ का अर्थ है- आधी सफलता. अस्तु, बालक के अन्नाहार के क्रम को श्रेष्ठतम संस्कारयुक्त वातावरण में करना अभीष्ट है. हमारी परम्परा यही है कि भोजन थाली में आते ही चींटी, कुत्ता आदि का भाग उसमें से निकालकर पंचबलि करते हैं. भोजन ईश्वर को समर्पण कर या अग्नि में आहुति देकर तब खाते हैं. होली का पर्व तो इसी प्रयोजन के लिए है.

नई फसल में से एक दाना भी मुख डालने से पूर्व, पहले उसकी आहुतियाँ होलिका यज्ञ में देते हैं । तब उसे खाने का अधिकार मिलता है. किसान फसल मींज-माँड़कर जब अन्नराशि तैयार कर लेता है, तो पहले उसमें से एक टोकरी भर कर धर्म कार्य के लिए अन्न निकालता है, तब घर ले जाता है. त्याग के संस्कार के साथ अन्न को प्रयोग करने की दृष्टि से ही धर्मघट-अन्नघट रखने की परिपाटी प्रचलित है. भोजन के पूर्व बलिवैश्व देव प्रक्रिया भी अन्न को यज्ञीय संस्कार देने के लिए की जाती है…

8  मुंडन/चूड़ाकर्म संस्कार :-

इस संस्कार में शिशु के सिर के बाल पहली बार उतारे जाते हैं. लौकिक रीति यह प्रचलित है कि मुण्डन, बालक की आयु एक वर्ष की होने तक करा लें अथवा दो वर्ष पूरा होने पर तीसरे वर्ष में कराएँ. यह समारोह इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि मस्तिष्कीय विकास एवं सुरक्षा पर इस सयम विशेष विचार किया जाता है और वह कार्यक्रम शिशु पोषण में सम्मिलित किया जाता है, जिससे उसका मानसिक विकास व्यवस्थित रूप से आरम्भ हो जाए.

 चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करते रहने के कारण मनुष्य कितने ही ऐसे पाशविक संस्कार, विचार, मनोभाव अपने भीतर धारण किये रहता है, जो मानव जीवन में अनुपयुक्त एवं अवांछनीय होते हैं. इन्हें हटाने और उस स्थान पर मानवतावादी आदर्शो को प्रतिष्ठापित किये जाने का कार्य इतना महान् एवं आवश्यक है कि वह हो सका, तो यही कहना होगा कि आकृति मात्र मनुष्य की हुई-प्रवृत्ति तो पशु की बनी रही ।हमारी परम्परा हमें सिखाती है कि बालों में स्मृतियाँ सुरक्षित रहती हैं अतः जन्म के साथ आये बालों को पूर्व जन्म की स्मृतियों को हटाने के लिए ही यह संस्कार किया जाता है.

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