हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 1

0
355
हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 1
हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 1
हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 1
हिन्दू धर्म के 16 संस्कार पार्ट – 1

जिसे अपनी संस्कृति एवं संस्कारो का ज्ञान नही उसका जन्म व्यर्थ है. सनातन अथवा हिन्दू धर्म की संस्कृति संस्कारों पर ही आधारित है. हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जीवन को पवित्र एवं मर्यादित बनाने के लिये संस्कारों का अविष्कार किया. धार्मिक ही नहीं वैज्ञानिक दृष्टि से भी इन संस्कारों का हमारे जीवन में विशेष महत्व है. भारतीय संस्कृति की महानता में इन संस्कारों का खासा योगदान है. आइए जानते है हिन्दू धर्म के संस्कार.

प्राचीन काल में हमारा प्रत्येक कार्य संस्कार से आरम्भ होता था. उस समय संस्कारों की संख्या भी लगभग चालीस थी। जैसे-जैसे समय बदलता गया तथा व्यस्तता बढती गई तो कुछ संस्कार स्वत: विलुप्त हो गये. इस प्रकार समयानुसार संशोधित होकर संस्कारों की संख्या निर्धारित होती गई. गौतम स्मृति में चालीस प्रकार के संस्कारों का उल्लेख है. महर्षि अंगिरा ने इनका अंतर्भाव पच्चीस संस्कारों में किया. व्यास स्मृति में सोलह संस्कारों का वर्णन हुआ है.

  हिन्दू धर्म  के 16 संस्कार ये निम्नानुसार हैं:-

1.गर्भाधान संस्कार

  1. पुंसवन संस्कार

3.सीमन्तोन्नयन संस्कार

4.जातकर्म संस्कार

5.नामकरण संस्कार

6.निष्क्रमण संस्कार

7.अन्नप्राशन संस्कार

8.मुंडन/चूडाकर्म संस्कार

9.विद्यारंभ संस्कार

10.कर्णवेध संस्कार

  1. यज्ञोपवीत संस्कार
  2. वेदारम्भ संस्कार
  3. केशान्त संस्कार
  4. समावर्तन संस्कार
  5. विवाह संस्कार

16.अन्त्येष्टि संस्कार/श्राद्ध संस्कार

  1. गर्भाधान संस्कारहमारे शास्त्रों में मान्य सोलह संस्कारों में गर्भाधान पहला है. गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है. गार्हस्थ्य जीवन का प्रमुख उद्देश्य श्रेष्ठ सन्तानोत्पत्ति है. उत्तम संतति की इच्छा रखनेवाले माता-पिता को गर्भाधान से पूर्व अपने तन और मन की पवित्रता के लिये यह संस्कार करना चाहिए. दैवी जगत् से शिशु की प्रगाढ़ता बढ़े तथा ब्रह्माजी की सृष्टि से वह अच्छी तरह परिचित होकर दीर्घकाल तक धर्म और मर्यादा की रक्षा करते हुए इस लोक का भोग करे यही इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है.विवाह उपरांत की जाने वाली विभिन्न पूजा और क्रियायें इसी का हिस्सा हैं.
  2. पुंसवन संस्कार :-

गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाय ।हिन्दू धर्म में, संस्कार परम्परा के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह तथ्य समझाए जाते हैं कि शारीरिक, मानसिक दृष्टि से परिपक्व हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान पैदा करने की पहल करें. उसके लिए अनुकूल वातवरण भी निर्मित किया जाता है. गर्भ के तीसरे माह में विधिवत पुंसवन संस्कार सम्पन्न कराया जाता है, क्योंकि इस समय तक गर्भस्थ शिशु के विचार तंत्र का विकास प्रारंभ हो जाता है. वेद मंत्रों, यज्ञीय वातावरण एवं संस्कार सूत्रों की प्रेरणाओं से शिशु के मानस पर तो श्रेष्ठ प्रभाव पड़ता ही है, अभिभावकों और परिजनों को भी यह प्रेरणा मिलती है कि भावी माँ के लिए श्रेष्ठ मनःस्थिति और परिस्थितियाँ कैसे विकसित की जाए.

3.सीमन्तोन्नयन संस्कार :-

सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना. गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है. इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं. यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है. हिन्दू धर्म के संस्कार इस तरह से है.

  1. जातकर्म संस्कार :-

नवजात शिशु के नालच्छेदन से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है। इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है. दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है. इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है.

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here