कौन सा गायक था जो लता और रफी से 50 गुना ज्यादा फीस लेता था
कौन सा गायक था जो लता और रफी से 50 गुना ज्यादा फीस लेता था

आज हम बताने जा रहे है ऐसी सख्सियत के बारें में जिनका अगर आप गाना सुन ले और उनका कद काठी देख ले तो आप विश्वास नहीं कर पाएंगे की क्या वो वहीं इंसान है जिसने गाना गाया  है या कोई और है ?. रौबीला चेहरा,बड़ी-बड़ी मुछे,पहलवान के जैसे बड़े और विशालकाय शरीर,पेट पर टिका सुरमंडल. जी हाँ आज हम बात कर रहे है बड़े गुलाम अली खान के बारे में.

ऐसी मीठी आवाज,ऐसा लगता है मानो मीठी वाणी से शहद टपक रहा हो. पटियाला घराने से ताल्लुक रखने वाले गुलाम अली खान  को शब्दों में समेत पाना बईमानी होगी. संगीत के क्षेत्र में हो या गायन के क्षेत्र में हो उनका लोहा आने वाली पीढ़ी भी मानती रहेंगी. संगीत के ऐसे साधक बहुत कम मिले है. हम ये भी कह सकते है ऐसी गुण से धनवान परिपूर्ण सख्सियत बहुत कम देखने को मिले है.  ये गायक सब कुछ गाते थे ध्रुपद,ठुमरी सबकुछ से परिपूर्ण थे.

चाहें वों ‘याद पिया की आए’ हो या ‘का करू सजनी ना आए बालम’,’नैना मोरे तरस रहे’ ही क्यूँ ना हो ये सारी ठुमरी आपके कानों से होकर गुजरी जरुर होगी. इस गायक की ठुमरी इतनी पोपुलर हुई की इसका आसान वर्शन ययुदास नेगाया और जिसको फिल्म स्वामी में इस्तमाल किया गया.

पटियाला घराने से ताल्लुक रखते थे ये गायक:-

बड़े गुलाब अली खान का जन्म 1902 में कसूर प्रान्त में हुआ. कसूर अब पाकिस्तान का हिस्सा है. इनके पिता बक्श खान भी उस दौर के जाने-माने गायक थे. केवल 7 साल की उम्र में उन्होने अपने चाचा से सारंगी और गाना दोनों सीखना शुरू किया. उस्ताद काले खान भी जाने-माने संगीत कंपोजर थे. 21 साल की उम्र में उस्ताद गुलाम अली खान वाराणसी आ गए.

वाराणसी आकर वो छोटे मोटे समाराहों में सारंगी बजाया करते थे. ऐसा कहा जाता है कोलकाता में बड़ा कॉन्सर्ट हुआ जिससे उनकी पहचान पुरे भारत में हुई. लोग उनके गायन को सराहना योग्य तारीफे देने लगे. अब गुलाम अली साहब किसी पहचान के मोहताज नहीं रह गए थे. अब लोग उनके गले का जादू देख और सुन चुके थे.

1947 में भारत का बंटवारा हुआ. जिसके बाद कसूर पाकिस्तान का हिस्सा बन गया. फिर खान साहब पाकिस्तान चले गए. इसके बाद वो भारत कुछ सालों बाद फिर वापस लौटकर आए. जब वापस बहरत आए तो यही के होकर रह गए. 1957 में मोरारजी देसाई की मदद से उन्हें हिंदुस्तान की नागरिकता मिल गई. गुलाम अली खान साहब कहा करते थे अगर हर घर में एक बच्चे को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत सिखाया गया होता तो देश का कभी बंटवारा नहीं होता.

गुलाम अली साहब का अधिकतर समय मुंबई,कोलकाता,लाहौर,हैदराबाद में घूमते हुए व्यतीत होता. गुलाम अली की आवाज और लोकप्रियता देखकर कई फिल्म निर्माताओं ने उन्हें फिल्म में गाने गवाने के लिए कहा लेकिन वे सबको मना करते रहें. फिल्म निर्माता आसिफ थे बस जो फिल्म मुगल-ए-आज़म में दो राग गाना गवाने के लिए गुलाम साहब को राजी कर पाए. अगर मेहनताना लेने की बात करें तो आसिफ से गुलाम अली साहब 25,000 हजार रूपये लिया करते थे. ये ऐसा दौर था जब लता जी और रफी साहब मेहनताना की तौर पर महज 500 रूपये लिया करते थे.

शास्त्रीय के साथ-साथ लोक संगीत के भी थे धनी :-

ठुमरी के साथ-साथ ध्रुपद तक गुलाम अली खान साहब बेहद सरलता से गाते थे. राग को लेकर खान साहब की तैयारी ऐसी थी की एक राग पर खान साहब घंटो तक गा सकते थे. बड़े गुलाम अली खान साहब ने हमेशा सुनानेवाले को ध्यान में रखकर गया. जिसकी वजह से उनके चाहनेवाले भारत पाकिस्तान के साथ-साथ पूरी दुनियाँ में फैले हुए है. राष्ट्रीय संगीत और लोक संगीत का रिश्ता बताते हुए वे राग पहाड़ी में एक रचना गाते थे वों है हरि ओम तत्सत.

अब समय था खान साहब को उनकी कला :-

1962 में भारत सरकार की तरफ से उन्हें पद्म भूषण से नवाजा गया. उन्हें संगीत नाटक एकेडमी अवार्ड से भी नवाजा गया. उन्होने कभी अपने पुरस्कार को तवेज्जो ना देकर लोगों के प्यार को दिया. अपने लम्बे गायन की दुनियाँ में लोगों ने खान साहब की गायन कला को ढेर सारा प्यार दिया.

अपने आखरी दिनों में गुलाम अली खान साहब लम्बी बीमारी से ग्रस्त रहते थे. इसके साथ-साथ खान साहब के अंतिम दिनों में वे पैरालिसिस के शिकार हो गए. हैदराबाद के बसिरगढ़ पैलेस में गुलाम अली खान साहब ने 1968 में दुनियाँ को अलविदा कह दिया.

ये पल पूरी दुनियाँ के लिए एक शोक का पल था. गुलाम अली खान साहब हमे छोड़ कर जा चुके है लेकिन उनका गायन अभी में हमारे दिलों में निहित है. उनके सम्मान में बसिरगढ़ की मुख्य गली का नाम उस्ताद बड़े गुलाब अली खान मार्ग रखा गया है. गुलाम अली खान साहब आप हमें हमेशा याद रहेंगे. ये हमारा दायित्वा है की आपके गायन को आपकी मेहनत को जीवंत बनाए रखे.

प्रमुख बिंदु :-

  • गुलाम अली खान साहब जिनकी फीस सुनकर आप चौंक जाएंगे.
  • क्या गाते थे गुलाम अली खान साहब.

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