खतरे की घंटी: हर हर मोदी से हार गए मोदी गोरखपुर, फुलपुर और अररिया में हुए उपचुनाव के परिणाम भाजपा के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं, यह देखते हुए की इन दोनों जगहों उत्तर प्रदेश और बिहार में भाजपा का शासन रहा हैं. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री  योगी आदित्यनाथ, जो अपराधियों के महांकाल की तरह उभरे है अपने गढ़ में बेताज बादशाह की तरह जाने जाते है. कही यह उनका अति आत्मविश्वास ही तो न था जो उनकी हार का कारण बना.

2017 में, जब उत्तर प्रदेश में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की थी. तब उन्होंने गैर-यादव ओबीसी समुदायों के तीसरे उम्मीदवारों को उतारा था. इन मतों की एक स्पष्ट राजनीतिक गठजोड़ हुई और इसके बदले में भाजपा को बहुत मदद मिली जो उनकी जीत का कारण भी बनी. बिहार के मामले में, 2015 में बीजेपी को नीतीश-लालू गठबंधन ने हराया था. पिछले साल बीजेपी और जनता दल यूनाइटेड एक साथ आए और गैर-यादव समुदाय तक पहुंच गए.

हालांकि उप-चुनाव में जिनके परिणाम बुधवार को घोषित किए गए थे …

हालांकि उप-चुनाव में जिनके परिणाम बुधवार को घोषित किए गए थे, इन संयोजनों ने भाजपा के लिए काम नहीं किया. प्रवीण निषाद और नागेंद्र प्रताप पटेल, जो क्रमशः गोरखपुर और फुलपुर से जीते, गैर-यादव ओबीसी समुदायों में से एक हैं. एक और दिलचस्प तथ्य यह हैं कि फुलपुर से सपा और भाजपा के दोनों उम्मीदवार कुर्मी हैं. हालांकि, मतदाताओ ने एक ही समूह से सम्बन्ध रखने वाले दोनों उम्मीदवारों में से सपा उम्मीदवार को चुना. ऐसा क्या कारण हो सकता हैं?. क्या भाजपा लहर थमने वाली हैं?. या बस ये एक चेतवानी हैं.

गोरखपुर में, निषाद समुदाय के सदस्यों ने एसपी उम्मीदवार का समर्थन किया जो एक ही समुदाय से हैं. निषाद ने हमेशा बीजेपी का समर्थन किया हैं. विश्लेषकों का कहना है कि गोरखपुर में पहली बार गोरखनाथ मठ के प्रतिनिधि भाजपा के उम्मीदवार नहीं थे. निषाद, ओबीसी समुदाय आदित्यनाथ के पारंपरिक समर्थक रहे हैं. रिपोर्ट की माने तो सपा के उम्मीदवार ऐसे नहीं थे जो सपा के पक्ष में वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित कर सकते थे.

अन्य महत्वपूर्ण चीज यह हैं कि सपा और बसपा

अन्य महत्वपूर्ण चीज यह हैं कि सपा और बसपा एक साथ इस चुनाव में आए. बसपा के दलित समर्थको ने भी चुनाव में एक प्रमुख भूमिका निभाई. यह 2019 के चुनाव से पहले भाजपा के लिए बड़ी चिंता का सबब हो सकती हैं. क्या योगी इसके जिम्मेदार हैं या नरेन्द्र मोदी जिन्होंने एक रैलियाँ तक नहीं की. समस्या का हल भाजपा को जल्द ही निकालना पड़ेगा. क्या अगर नरेन्द्र मोदी रैलियाँ नहीं करेंगे तो भाजपा नहीं जीतेगी?. सवाल तो उठेंगे.

गैर-यादव के उम्मीदवारों के साथ भाजपा अगले चुनाव में तो दाव बिलकुल नहीं खेलेगीं. यह स्पष्ट रूप से भाजपा के लिए एक संकेत हैं कि ये 2019 लोकसभा के लिए तैयारी अधूरी हैं. बहुत कुछ करना हैं अगर भाजपा को फिर से सत्ता में काबिज रहना हैं.

प्रमुख बिंदु :-

  • भाजपा की हार, सपा-बसपा जीती.
  • योगी के गढ़ में हार.

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