बहूत सारे लोगो को यह जानकारी नहीं है की वह स्थान जहाँ शिव एवं पार्वती का विवाह हुआ था आज भी एक तीर्थ स्थान के रूप में धरती पर मौजूद है. लाखो श्रद्धालु भगवान् शिव के इस ससुराल में पुण्यलाभ के लिए यहाँ आते है. भगवान् शिव के ससुराल की यह पवित्र भूमि हरिद्वार के पास कनखल नामक स्थान पर मौजूद है. यहाँ भगवान् शिव (Bhagwan Shiv) का एक पवित्र मंदिर है, जिसे दक्षेस्वर महादेव के नाम से जाना जाता है.

यही वह जगह है जहां भगवान् शिव (Bhagwan Shiv) और पार्वती विवाह के पवित्र बंधन में बंधे थे. और यही एक बड़ी पौराणिक घटना घटित हुई थी जिसके बारे में हम आपको आगे बताने जा रहे है.

क्या है शिव पार्वती के विवाह की कहानी?

भगवान् शिव (Bhagwan Shiv) के विवाह के सम्बन्ध में बड़ी ही रोचक कथा शास्त्रों में बतायी गयी है. कहते है की की महाराज दक्ष की १० पुत्रिया थी, और सभी गुणवान और रूपवान थी. पर राजा दक्ष एक ऐसी पुत्री चहाते थे, जो गुणवान होने के साथ सर्वशक्ति संपन्न भी हो. इस स्वप्न की पूर्ति के लिये उन्होने घनघोर तप शूरु किया. तब भगवती आद्या ने प्रकट होकर दक्ष से वरदान मांगने को कहा, दक्ष ने सर्वशक्ति संपन्न गुणवान पुत्री को पाने की अपनी आकांक्षा जाहिर की, तब भवगती ने प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया की मै स्वयं तुम्हारे घर पुत्री के रूप में जन्म लूँगी.

इसके बाद दक्ष के घर एक रूपवती और गुणवान पुत्री का जन्म हुआ. बचपन से ही उनकी ये पुत्री अध्यात्मिक स्वाभाव की थी. भगवान् शिव (Bhagwan Shiv) की भक्ती में वे सदेव मग्न रहने लगी. इधर राजा दक्ष अपनी बेटी के गुणों को देखते हुवे फुले नहीं समाते थे. वे उसका विवाह उनसे भी अधिक वैभवशाली किसी चक्रवर्ती राजा या देवता से करना चहाते थे.

उधर पार्वती ने मन ही मन भगवान् शिव (Bhagwan Shiv) को अपना पति मान लिया था. इसके लिए पार्वती ने शिव का घोर ताप किया और शिव ने प्रसन्न होकर विवाह की बात मान ली. लेकिन राजा दक्ष तैयार नहीं हुवे लेकिन ब्रह्मा जी ने उन्हें बताया की पार्वती ही भगवती आद्या का अवतार है एवं शिव आदि पुरुष है तब दक्ष ने उनके विवाह को सहमती दी दी. तब पार्वती कैलाश पर जा कर रहने लगी.

क्यों किया था शिव ने दक्ष का वध

एक समय किसी कारण से दक्ष और शिव में किसी बात पर मन मुटाव हो गया. उन्होने अपने द्वारा आयोजित यज्ञ में शिव एवं पार्वती को आमंत्रित नहीं किया.

पार्वती ने अपने पिता के घर जाने की जिद की लेकिन शिव ने समझाया की विवाह के पश्चात् पत्नी का सुसराल ही उसका घर होता है लेकिन पार्वती नहीं मानी और जिद करने लगी. शिव ने आज्ञा दी दी.

लेकिन जब वे वहां पहुँची तो उनकी बहूत उपेक्षा हुई और जब उन्होने देखा की सभी देवताओं के लिए वहां आसन लगे थे लेकिन शिव के लिए कोई भी आसन वहां नहीं था. तब दुखी और आहात होकर पार्वती ने हवन कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए. जब शिव को ये पता चला तो उन्होने ने अपने गण विरभद्र को सेना के साथ भेजा जिसने यज्ञ को तहस नहस करा दिया और दक्ष की गर्दन धड से अलग कर दी.

भगवान् शंकर जब वहां पहुंचे तो वे सती के शव को देखकर व्याकुल हो गऐ और क्रोध में आकर सती के मृत शरीर को उठा कर तांडव नृत्य करने लगे. उनके क्रोध से सारा ब्रह्माण काँप उठा, चारो तरफ प्रलय का मंजर नजर आने लगा. देवताओ ने चिंतित कर शिव से मिन्नतें की और उन्हें शांत किया बाद में देवताओं की प्रार्थना पर शिव ने दक्ष को प्राण दान दिया और दक्ष के धड पर बकरे का सर जोड़ दिया. दक्ष ने पुन: जीवित होकर शिव से क्षमा मांगी.

कहाँ और कैसी है ये शिव की सुसराल?

कनखल गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित एक सुन्दर नगर है, यह शहर हरिद्वार से बिलकुल सटा हुआ है. यहाँ पर सती कुंड, दक्ष महादेव मंदिर, और प्रजापति मंदिर विशेष देखने लायक है. कनखल विश्वप्रसिद्ध गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के लिये भी दुनिया भर में जाना जाता है.

क्या सचमुच शिव आते है कनखल मे ?

वैदिक मान्यताओ के अनुसार भगवान् शिव (Bhagwan Shiv) सावन के महीने में कनखल में पुरे एक माह तक निवास करते है. उनके साथ सभी देवी देवता, नवग्रह, एवं गण आदि भी उनके साथ उपस्थित रहते है.  पुराणों में वर्णित उस प्राचीन यज्ञकुंड पर ही यह मंदिर स्थापित है जो की दक्षेश्वर माहदेव के नाम से प्रसिद्द है. पास ही गंगा नदी के किनारे दक्षा घाट है जहां सावन माह में लाखो की संख्या में श्रद्धालु स्नान का पुण्य अर्जित करते है.

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