मोदी सरकार जम्मू कश्मीर में कमजोर पड़ रही है सीएम ने पाकिस्तान से बात करने की सलाह दे डाली

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क्या मोदी सरकार जम्मू कश्मीर में कमजोर पड़ रही है? मुख्य मंत्री ने एक बार फिर मोदी सरकार से अपील की है की वो अपनी वर्तमान Policy पर फिर से विचार करें. मोदी सरकार की वर्तमान Policy कहती है कि पाकिस्तान से तब तक बात नहीं होगी जब तक की वह सीमा पार से आतंकवादी गतिविधि बंद नहीं कर देता.  मोदी सरकार ईट का जवाब पत्थर से देने की अपनी नीति पर अडिग है.

क्या मोदी सरकार जम्मू कश्मीर में कमजोर पड़ रही है?

सरकार कि इस Policy पर जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने कहा “पाकिस्तान से बातचीत करना जरुरी है अगर हम रक्तपात बंद करना चहाते है. “मै जानती हूँ, कि आज शाम को मीडिया द्वारा मेरे ऊपर देश विरोधी होने ठप्पा लगा दिया जाएगा, पर मुझे इस से कोइ फर्क नहीं पड़ता. जम्मू और कश्मीर की जनता सह रही है.  हमें बातचीत करना होगा क्यों कि युद्ध विकल्प नहीं है.”

आंकड़े

महबूबा के इस बयान के ठीक बाद सुन्जवान से आतंकी हमले कि खबर आयी है. इस साल जम्मू कश्मीर में आतंकवादी घटनाओं में तेईस लोगो की जाने गयी है.  जो की पिछले दस सालो में दो महीने के ही भीतर होने वाली अधिकतम संख्या है.  इन मौतों में सीजफायर उल्लघन एवं आतंकवादी घटनाये ही कारण रही है.  इसे पहले करीब 43 नागरिक एवं सुरक्षा कर्मी जनवरी एवं फरवरी 2007 में मारे गए थे.  यह सब कारण देखते हूए महबूबा मुफ़्ती की अपील उचित लगती है.

अगर हम पुराने रिकार्ड्स पर नजर डालते हैं तो पाते हैं, कि हम पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद सन 1980 से देख रहे है.  साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल की एक रिपोर्ट के अनुसार – कूल मिलाकर 1988 में आतंक कि 390 घटनाये हुई है, जहाँ 29 नागरिको को मिला कर 31 लोगों ने जाने गवाईं.  इसमे एक आतंकी और एक जवान भी मारे गये थे. जब हम आंकड़ो की तरफ देखते हैं तो पाते हैं कि इस साल के बाद इन घटनाओं में आचानक तीव्रता आ गयी. जहां आतंकी हमलो की संख्या बड कर 1989 में 2154 हो गयी. जहां 92 लोग मारे गए जिनमे 79 सामान्य नागरिक थे.  इसमे 13 आतंकी भी मारे गए थे.

आंकड़ो के अनुसार हर साल घटनाओं की संख्या में बढोत्तरी के साथ 1990 के दशक में यह अपने चरम पर पहुचं गयी. 1995 को छोड़ कर यह पैटर्न 1996 तक चला.  इसके बाद 1997 एवं 98 में कुछ कमी आयी.  1999 में यह घटनाये फिर तेज हो गयी.

शांतिवार्ता के साथ साथ चली आतंकी एवं सीजफायर की घटनाये

शांति स्थापना के अनेकों प्रयास अब तक किये जाते रहे हैं. एन डी ए सरकार ने अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में शांति वार्ता की शुरुआत की थी.  अटल बिहारी वाजपेयी ने शान्ति के प्रयासों में देल्ही से लाहौर तक की बस यात्रा की थी.  और उस यात्रा के ठीक बाद कारगिल घुसपेठ एवं भारत पकिस्तान के बीच छोटे युद्ध की शुरुआत हो गयी.

जिस वर्ष वाजपेयी सरकार ने पाकिस्तान राष्ट्रपति को आगरा समिट के दौरान बुलाया था उसी साल के आंकड़े देखे तो पता चलता है कि उसी वर्ष आतंकी घटनाओं एवं सीजफायर उलंघन की वजह से मौतों की संक्या 4507 हो गयी जो अब तक का सब से बड़ा आंकडा है.  इसके बाद अगले दशक में इन आंकड़ो में कुछ गिरावट आयी जो की 2012 में अपने न्यूनतम पर पहुचं गयी जहां 117 लोगों ने अपनी जाने गवाई.  इसके बाद इन घटनाओं में वृद्धि होती रही है एवं इसके बाद पिछले दो वर्षो में इन घटनाओं में तीव्र वृद्धी देखी गयी है.

निष्कर्ष

जहां तक सीज फायर के उल्लंघन की घटनाओं का सवाल है. इनकी घटनाएं पाकिस्तान की और से लगातार होती रही, यंहा तक की शांति वार्ता के दौरान भी.  तमाम शांति प्रयासों के बाद भी पकिस्तान की और से ये घटनाये होती रही है.  इन सब आंकड़ो को देखते हूए हमें यह सोचना होगा की महबूबा मुफ़्ती जी की शांती वार्ता के लिये भारत के पीएम से अपील कितनी उचीत है.

क्या मोदी सरकार जम्मू कश्मीर में कमजोर पड़ रही है?

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