क्या जहरीले जानवर भी अपने मूल गुण भुल सकते है, क्या सांप बिच्छु (bichchhu) अपनी मूल आदतों से दूर हो सकते है. क्या उन्हें सिखाया या ट्रेंड किया जा सकता है? शायद नहीं. क्यों की किसी चोपाया पशुओ जिनमे खूंखार जंगली जानवर भी शामिल है को सिखा लेने की घटना हमने कई बार पडी, सूनी, और देखी है, ये एक आम बात है.  लेकिन सांप बिच्छु (bichchhu) जैसे जीव पडे लिखे लोगो की तरह समझदारी दिखाने लगे तो चमत्कार तो मानना ही पड़ेगा. क्या ये माता के मंदिर में भक्तो के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए ऐसा करते है. परन्तू लगता है करते तो है, हजारो लोग इसके साक्षी है. पर यह कैसे होता है, सोच कर भी चक्कर आने लगते है. यहाँ जो होता है उसे देखकर अच्छे अच्छे भी चकित हो जाये.

क्या है यहाँ के चमत्कार

ऐसा चमत्कार होता है कर्नाटक के यादगिर जिले स्थित कांडकुर गाँव में. यहाँ एक माता का मंदिर है. जहाँ नागपंचमी के दुसरे दिन एक बड़ा सा मेला लगता है, लोग दूर दूर से यहाँ माता के दर्शन करने आते है. और एक चमत्कार के साक्षी बनते है. सेकड़ो की संख्या में यहाँ बिचछु इस मेले में आपको दिखाई देंगे. ये लोगो के शरिर पर रेंगते है. लोग इन्हें रेंगने देते है, खुद इन्हें रेंगने के लिए आमंत्रित करते है पर मजाल है कि एक भी बिच्छु किसी को काट खाये.

क्या कही और भी है इसी जगह जहाँ बिच्छू अपनी जहरीली आदत छोड़ देते है?

जी हाँ हम आप को ऐसी ही एक और जगह के बारे में बताने जा रहे है जहाँ भी मिलता जुलता चमत्कार लोगो को देखने को मिलता है. ये एक और जगह है उत्तरप्रदेश के अमरोहा स्थित एक मजार है यंहा के बिच्छू भी स्वभाव बदलकर यहाँ आने वाले श्रद्धालुओ पर डंक नहीं मारते. सुल्तान ए अमरोहा के नाम से मशहूर हजरत सैयद शर्फुद्दीन शाह विलायत की इस दरगाह पर आने वाले श्रद्धालुओ को भी यहाँ के बिच्छुओं (bichchhu)से ज़रा भी डर नहीं लगता है. वे लोग भी स्वेच्छा से इन बिच्छुओ (bichchhu) को अपने ऊपर रेंगने देते है.

इस दरगाह से जुडी एक दिलचस्प कहानी

जिसके अनुसार, अरब देशों के वासित में जन्मे शाह विलायत नमक एक शख्स अपने पीर के हुक्म पर भारत में आए थे। शाह विलायत जी के पीर ने उन्हें निर्देश दिया था कि हिन्दुस्तान में जहां पर आम-चावल की रोटी और रोहू मछली का प्रचलन हो वहीं पर अपना डेरा दल लेना. ईरान, और इराक की यात्रा करते हुए वे भारत के मुल्तान शहर (अब अफगानिस्तान में) है पहुंचे।

वहां से चलकर वे सन १२६२ में उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद के अजीजनगर में आए जहां पर उन्हें आम, रोहू मछली और चावल की रोटी मिली और वे यहीं पर ठहर गए.  यहाँ के दरगाह प्रबंध समिति के सदस्य मरगूब अहमद के अनुसार शाह विलायत के द्वारा ही अजीज नगर का नाम पहले आम रोह रखा गया जो कि बाद में चल कर अमरोहा पड गया. कहानी के अनुसार, जब शाह विलायत यहां पहुंचे तो इसकी जानकारी पीर सैय्यद शाह नसीरूद्दीन को हुई.

क्या किया शाह नसीरूद्दीन जी ने

शाह नसीरूद्दीन जी ने प्रतिक स्वरुप उनके पास पानी से भरा हुआ एक प्याला पहुचांया जिसमें एक फूल भी था. प्याले में रखे एक फूल का वहां पर आशय था कि प्याले में एक ही फूल रह सकता है. दूसरे फूल की यहां जगह नहीं है, उन्हें यहाँ से चले जाना चाहिये. इस पर शाह ने मुस्कुरा कर प्याले में एक गुलाब का फूल डालकर कर वापस भिजवा दिया. जिसमे ये सन्देश छुपा था कि वे पानी में तैर रहे खुशबूदार गुलाब के फुल की तरह रहेंगे और फुल की तरह ही उनके प्रेम और भाईचारे की खुशबु चारों ओर फैल जाएगी.

शाह नसीरूद्दीन को इस बात पर बहूत गुस्सा आ गया और उन्होंने शाह को श्राप देते हुए कहा कि उनके चारो और बिच्छुओं की भरमार हो जायेगी. शाह विलायत ने कहा कि यही बिच्छू उनकी प्रसिद्धि की वजह भी बनेंगे.  जुलाई १३८१  में शाह विलायत जी का देहांत हो गया और उन्हें कयाम के निकट कदीमी कब्रिस्तान में दफना दिया गया.

जगह का चमत्कार

इस श्राप के बाद से ही वहां बिच्छुओं की तादाद आश्चर्यजनक तरीके से बड गयी. कहते है कि तब से ही बिच्छु (bichchhu)यहाँ बड़ी तादाद में पाए जाते है.  उनकी दरगाह पर श्रद्धलुओ का ताँता लगा ही रहता है। यहां आने फरियादियो को कभी बिच्छू नहीं काटते हैं. लोग बडे मजे से बिच्छुओं को अपनी हथेली पर रेंगने देते हैं। शाह विलायत जी की दरगाह पर हर साल चार दिनों का उर्स भरता है जो रजब की 18  तारीख से प्रारंभ होकर उनके देहांत के दिन 21 रजब तक चलता है.

इस उर्स में देश-विदेश, खासकर खाड़ी देशों के अकीदतमंद हाजिरी लगाने के लिए यहाँ पहुंचते हैं.

तो आपने देखा कि ऐसी है हमारे देश की धरती जो दैवीय चमत्कारों से भरी पडी है.

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