कुंडलिनी जागरण (Kundilini Jagran or Kundilini awakening) शरीर और मन की सोई हुई शक्ती को जगाने की एक प्रक्रिया है. कुंडलिनी क्रिया वास्तव में ध्यान का ही एक रूप है. ध्यान की प्रक्रिया से ही होकर गूजरकर इस क्रिया को पूरा किया जाता है. योग के जरिये शरीर में सोई हुई सुप्त शक्तियों को जागृत करने की प्रक्रिया ही कुंडलिनी जागरण (Kundilini Jagran or Kundilini awakening) कहलाती है. इस पुरी प्रक्रिया में शरीर एवं मन में अपार उर्जा का संचरण होता है.  हमारे योग शास्त्रों में बहूत ही विस्तार से इसका जिक्र किया हुआ है. इसी के अनुभव को प्राप्त करने के लिए भारी संख्या में विदेशी हमारे देश में आकर योग एवं ध्यान की शिक्षा लेते है.

कैसे जाग्रत होती है कुंडली?

हमारे शरीर में सात चक्र उपस्थित होते हैं, जो कि निम्न है, मुलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्रार। कुंडलिनी योग के द्वारा इन् 7 चक्रों को भेदते हुऐ सहस्रार तक पहुंचा जाता है, जिसके फलस्वरूप मनुष्य को शक्ति और सिद्धि का ज्ञान प्राप्त होता है. संयम और नियमों का पालन करते हुए लगातार ध्यान करते हुवे इसे क्रिया को पूरा किया जाता है. और जब यह क्रिया पूर्ण हो जाती है तो कहते है की व्यक्ति पहले जैसा नहीं रह जाता. वह दिव्य पुरुष बन जाता है

ऐसा माना जाता है कि हमारे शारीर में सात चक्र होते है. कुंडलिनी शक्ति हमारे मूलाधार चक्र में सुनहरी सर्पिणी की तरह साढ़े तीन फेरे लेकर अवस्थित होती है. जब तक इसका जागरण नहीं होता तब तक मनुष्य सांसारिक विषयों और भोगो की ओर भागता रहता हैं. परन्तु इसके जाग्रत होने के बाद मनुष्य एक दिव्यता का अपने अन्दर अनुभव करने लगता है. एक नये संसार का छोर उसके लिए खुल जाता है.

कैसा लगता है जब आपकी कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होने लगती है?

जब कुंडलिनी शक्ति जाग्रत होने लगती है तब ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि कोई सर्पिलाकार तरंग आपके मूलाधार चक्र से ऊपर उठने लगी है जिसका एक सिरा मूलाधार चक्र पर रहता है. यह दूसरा सिरा सर्पिल आकर में रीढ़ की हड्डी के चारों और घूमता हुआ ऊपर की और उठता हुआ सा महसूस होता है. इस प्रक्रिया के शुरू होने के दौरान साधक लोग भिन्न भिन्न अनुभवो से गुजरते है. कभी कभी साधक को देवी-देवताओं के दर्शन होने लगती हैं. किसी को ॐ या हूं हूं की तेज ध्वनि सुनाई देने लगती है.

आंखों के सामने भिन्न भिन्न चमकदार रंग का प्रकाश छाने लगता है, पहले काला, फिर पीला और बाद में नीला रंग दिखाई देना लगता है. साधक को अपना शरीर बिलकुल हल्का हो गया लगने लगता है. ऐसा लगता है की आपका शरीर हल्का होकर ऊपर नीचे हो रहा हो. ऐसा लगता है जैसे कोई तरंग आपकी रीड के निचले भाग से मस्तिष्क के उस भाग तक जहां हम चोटी रखते है (सहस्रार चक्र) तक चल कर जा रही हो. मानो कुछ है जो ऊपर की तरफ जाने की कोशिश कर रहा हो. पुरी रीढ़ की हड्डी में कंपन सा होने लगता है. कई बार साधकों को एक से अधिक शरीरों का आभास होने लगता है.

क्या साधक कभी कभी घबरा भी जाता है?

साधक कई बार घबरा भी जाता है. परन्तु विद्वानों का कहना है, कि इसमें घबराने लायक कोई भी बात नहीं होती है. वह शारीर जिसे हम जानते है वह स्थूल शरीर कहलाता है. दुसरे नंबर का शरीर सूक्ष्म शरीर (मनोमय शरीर) कहलाता है एवं तीसरे नंबर का शरीर कारण शरीर कहलाता है. मनोमय शरीर और सूक्ष्म शरीर भी हमारे स्थूल शारीर की ही भांति ही है यानि ये भी देखने, सूंघने, खाने, पीने, चलने बोलने आदि की क्रिया कर सकते है. परन्तु इसके लिए कोई दीवार नहीं होती है इसी लिए इसे सूक्ष्म कहा जाता है. यह हर जगह पर आ और जा सकता है क्योंकि हमारे मन का संकल्प ही इसका मुख्य स्वरुप है.

तीसरा शरीर कारण शरीर है इस शरीर में कामना के बीज विद्यमान होते हैं. मृत्यु के बाद यही शरीर एक स्थान से दुसरे स्थान पर पहूंचता है और इसी के द्वारा पुनः मनोमय व स्थूल शरीर की मनुष्य को प्राप्ति होती है अर्थात नवीन जन्म होता है. कभी कभी कई सिद्ध योगी इसी कारण शरीर के द्वारा परकाय प्रवेश की सामर्थ्य हासिल कर लेते हैं. कुल मिला कर ये सब अनुभव अपने आप में विलक्षण होते है.

कभी कभी क्या ये प्रक्रिया बीच में  रुक भी जाती है ?

कभी कभी तरंग का यह प्रवाह सर्पिल गति करता हुआ किसी भी चक्र पर आकर रुक भी सकता है, लेकिन कुंडलिनी जागरण (Kundilini Jagran or Kundilini awakening) तब ही पूरा माना जाता है जब कुंडलिनी का यह छोर सभी चर्को को भेदता हुआ सहस्त्र्सार तक पहुँच जाये.

शास्त्रों के हिसाब से कुंडलिनी जागरण (Kundilini Jagran or Kundilini awakening) होने के पश्चात् कई दिव्य सिद्धिया भी साधक को प्राप्त होने लगती है, जैसे हवा में उड़ना, पर काया प्रवेश, गायब जो जाना आदि लेकीन इस मुकाम तक हर कोई नहीं पहुँच पाता है.

सामान्य जीवन में क्या है इसका महत्व

कुंडलिनी योग से मिलने वाली सिद्धियों की कोई भी सीमा नहीं होती। इसके द्वारा मनुष्य अपने अंदर की सकारात्मक शक्ति को जाग्रत कर कर अपने और ओरो के दुख: दूर करने के काबिल बन पाता है. ध्यान योग की इस प्रक्रिया का असर सामान्य जीवन में भी अनेको तरह से दिखाई देता है.

 

  1. आपका रोग प्रतिरोधक तंत्र मजबूत होता है|
  2. यह तनाव और अवसाद को छुटकारा मिलता है|
  3. यह मन, शरीर और आत्मा को एक रेखा में लाता है|
  4. कुंडलिनी योग धूम्रपान और शराब की लत को छुडाने में प्रभावशाली है|
  5. कुंडलिनी के 7 चक्रों का जागरण होने पर मनुष्य को शक्ति और सिद्धि की प्राप्ती होने लगती है|
  6. ज्ञानेन्द्रियों की सामर्थ्य बढती है फलस्वरूप देखने, सूंघने, महसूस करने और स्वाद लेने की क्षमता बढ़ती है।
  7. नकारात्मक ऊर्जा सकारात्मक ऊर्जा में परिवर्तित होने लगती है.

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