1974 में शुरू हुए इस आंदोलन की जनक गौरी देवी थीं जिन्हें चिपको वूमन के नाम से भी जाना जाता है. आंदोलन के दौरान पांचवीं क्लास तक पढ़ी गौरा देवी की पर्यावरण विज्ञान की समझ और उनकी सूझबूझ ने अपने सीने को बंदूक के आगे कर के, अपनी जान पर खेल कर, जो काम किया, उसने उन्हें सिर्फ रैंणी गांव का ही नहीं, उत्तराखंड का ही नहीं, बल्कि पूरे देश का हीरो बना दिया था. विदेशों में उन्हें ‘Chipko Woman from India’ कहा जाने लगा. चिपको आंदोलन’ एक आदिवासी औरत गौरा देवी के अदम्य साहस और सूझबूझ की दास्तान है.

कैसे हुई chipko Andolan कि शुरुआत-

चिपको आंदोलन की शुरुआत पर्यावरण को बचाने के लिए हुई थी. आंदोलन की शुरुआत उत्तराखंड के चमोली जिले से हुई थी. उस समय उत्तर प्रदेश में पड़ने वाली अलकनंदा घाटी के मंडल गांव में लोगों ने यह आंदोलन शुरू किया. 1973 में वन विभाग के ठेकेदारों ने जंगलों के पेड़ों की कटाई शुरू कर दी थी और तभी चिपको आंदोलन ने जन्म लिया. इसके बाद राज्य के सभी पहाड़ी जिलों में यह आंदोलन फैल गया. चिपको आंदोलन में पर्यावरणविद् चंडी प्रसाद भट्ट और उनकी संस्था दशोली ग्राम स्वराज्य संघ का भी अहम रोल रहा.

इस आंदोलन में भाग लेने वालों में गौरा देवी के अलावा धूम सिंह नेगी, बचनी देवी और सुदेशा देवी भी शामिल थीं. गांधीवादी सुधारक सुंदरलाल बहुगुणा ने भी इस आंदोलन को दिशा दी और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से अपील की. जिसके बाद पेड़ों को काटने पर रोक लगा दी गई.

उत्तराखंड से पहले चिपको आंदोलन का जिक्र राजस्थान में भी मिलता है. 18वीं सदी में राजस्थान में यह आंदोलन चला. जोधपुर के महाराज ने जब पेड़ों को काटने का फरमान सुनाया, तब बिश्नोई समाज के लोग पेड़ों से चिपक गए. इसके बाद राजा को पेड़ काटने का आदेश वापस लेना पड़ा.

क्यों चिपको आन्दोलन सफल रहा ?

वनों की अवैध कटाई ने पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचाया है. वषों से हो रही लगातार अवैध कटाई ने जहां मानवीय जीवन को प्रभावित किया है तो वहीं असंतुलित मौसम चक्र को भी जन्म दिया है. वनों की अंधाधुंध कटाई होने के कारण देश का वन क्षेत्र घटता जा रहा है जो पर्यावरण की दृष्टि से अत्यंत चिंताजनक है. पर्यावरण और वनों के संरक्षण के उद्देशार्थ वन दिवस हर साल 21 मार्च मनाया जाता है जिसकी शुरुआत वर्ष 1971 में यूरोपीय कृषि परिसंघ की 23वीं महासभा द्वारा की गयी थी पर भारत में वन दिवस की शुरूआत 1950 में ही शुरू हो गयी थी.

देश में वनों की कटाई रोकने के लिए ‘चिपको आंदोलन’ की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. वनों की इस कटाई को रोकने के लिए लोग पेड़ों से चिपक के खड़े हो गये और पेड़ों को काटने नहीं दिया गया. इस पर सभी की सहमती से वनों की कटाई को रोक दिया गया. इसलिए आन्दोलन सफल रहा और पर्यावरण के लिए और हमारे लिए लाभकारी रहा.

गूगल ने डूडल बनाकर दिया सम्मान

चिपको आंदोलन की आज 45वीं सालगिरह है, इस मौके पर गूगल ने डूडल बनाकर सम्मान दिया है. इस आंदोलन की शुरुआत 1974 में पेड़ों की रक्षा के लिए उत्तराखंड में हुई थी. चिपको आंदोलन की एक मुख्य बात ये थी कि इसमें महिलाओं ने भारी संख्या में भाग लिया था. जैसा कि डूडल में दिखाया गया है कि कैसे महिलाएं पेड़ों के आस-पास उन्हें बचाने की कोशिश कर रही है जैसे आंदोलन के दौरान किया था. ये आंदोलन उत्तराखंड से शुरू होकर पूरे देश में फैल गया था.

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