मधुवनी रेलवे स्टेशन बना परंपरागत मिथिला चित्रकला का केंद्र

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मधुवनी रेलवे स्टेशन बना परंपरागत मिथिला चित्रकला का केंद्र
मधुवनी रेलवे स्टेशन बना परंपरागत मिथिला चित्रकला का केंद्र

भारत में लगभग आप किसी भी जगह चले जाओ, अगर किसी भी शहर की गंदगी को देखा जाये तो रेलवे स्टेशन उस शहर की टॉप 5 जगहों में से एक होगा जो गन्दा होगा. यहाँ आपको दीवारों से लेकर हर जगह गंदगी देखने को मिल जाएगी. दीवारों पर यहां आपको पान या गुटखे की पीक से सुसज्जित दीवारे ही दिखाई देंगी. पर अगर एसा हो की किसी स्टेशन पर आपको दीवारों पर पीक की जगह बेहतरीन कला कृतिया देखने को मिले तो मुझे लगता आप तो यकीन नहीं करेंगें, कि कोई रेलवे स्टेशन पर ऐसा कैसे हो सकता है. पर ऐसा हुआ है बिहार के मधुबनी रेलवे स्टेशन पर जहाँ आपको कुछ ऐसा ही लगेगा की आप रेलवे स्टेशन पर नहीं हैं.

यहां आपको स्टेशन की दीवारों पर मधुबनी पेंटिंग स्टाइल की चित्रकारी देखने को मिलेगी, दरअसल यह कोशिश है पूर्व मध्य रेलवे की जो मधुबनी रेलवे स्टेशन को देश का सबसे सुंदर रेलवे स्टेशन बनाने के लिए प्रयासरत है. इस स्टेशन पर 10 हजार वर्ग फीट में पेंटिंग बन चुकी है, 5 हजार वर्ग फीट को सजाने के लिए 150 से ज्यादा स्थानीय कलाकार जुटे हुए हैं. ये कलाकार अपनी इच्छा से मधुबनी रेलवे स्टेशन को सजाने-संवारने के काम में दिन-रात एक किए हुए हैं.

कैसे होती है मिथिला चित्रकला ?

मिथिला चित्रकला में आपको देवी-देवताओं की सूरज, चांद, तुलसी, पीपल के वृक्ष जैसे चित्रों को संगृहीत कर बनयी गयी कलाकृति देखने को मिलेगी. इसमें डार्क रंगों का इस्तेमाल होता है. एक समय में इन रंगों की खूबी यह होती थी कि पीले, गुलाबी, हरे रंग हल्दी, केले के पत्तों और पीपल की छाल वगैरह से बनाए जाते थे. मधुबनी पेंटिंग दो प्रकार से की जाती है. दीवार पर बनाई जाने वाली भित्ति चित्रकला और दरवाजे के बाहर बनाई जाने वाली अल्पना.

इसकी पांच स्टाइल हैं

भरनी, कचनी, तांत्रिक, गोदना और कोहबर, पेंटिंग करने के लिए ब्रश की जगह माचिस की तीली या बांस की कलम का उपयोग किया जाता है. रंग निकले नहीं इसलिए पारंपरिक रुप से इसमें बबूल के पेड की गोंद मिलाई जाती थी.

मधुबनी चित्रकला की ख्याति धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल चुकी है. एक समय वह आया जब इसे बौद्धिक संपदा अधिकार नियम के तहत जीआई स्टेटस मिला. मतलब यह माना गया कि बिहार के मधुबनी शहर में होने वाली यह चित्रकला ही असली मधुबनी पेंटिंग है. यहीं इसका जन्म हुआ है.

आज इस मधुबनी चित्रकला को पहचान दिलाने वाली और कोई नही बिहार की सीता देवी हैं. इन्हें 1969 में बिहार सरकार द्वारा सम्मानित किया गया था. 1981 में इन्हें राष्ट्रपति ने पद्मश्री से सम्मानित किया था, 2006 में इन्हें शिल्प गुरु सम्मान मिला. इनके अलावा जगदंबा देवी, गंगा देवी, महासुंदरी देवी समेत यहाँ के कई कलाकारों को राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चूका है.

क्या होगा आपका योगदान

अब देखना यह है कि हमारी सांस्कृतिक धरोहर के जरिए रेलवे स्टेशन को सजाने और उसे बनाए रखने के काम में जनता कितना योगदान देती है. इसे वापिस से वैसे ही कर देगी जहाँ इस्पे पीक के निशान थे या इसको बनाये रखने में अपना पूरा सहयोग देगी.

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