तेरहवीं नाम तो आपने कई बार सुना होगा और पता भी होगा की जब कोई इंसान दुनिया छोड़ देता है तो उसके मरने के तेरह दिन बाद मृत्युभोज होता है. कई बार जब ये बात हमारे सामने आती है तो हम खाना तो खा आते हैं पर क्या आपको पता है ये खाना क्यों हो रहा है. इंसान नहीं रह और आप उसके जाने के गम में खाना खिला रहे हो कुछ अन सुलझे अनजाने ऐसे ही सवाल आपके सामने आते रहते हैं.

जिन्हें आप खुद नहीं जानना चाहते है. सबके यहाँ तेरहवीं होती हैं. पर क्यों होती हैं ये तो आपको नही पता ना. इस बारे में जाने वाले भी यही कहते हैं की अब इस प्रक्रिया को बंद कर देना चाहिये. क्योंकि एक तो अपनों को खोने का दु:ख और ऊपर से तेहरवीं का भारी भरकम खर्चा. यह एक कुरीति है आप भी इस बात को समझिये. पर जो हो रहा है या जो होगा उसके लिए हम खुद जिम्मेदार हैं.

मृत्युभोज या तेरहवीं के विषय में हमारे जाने माने मुनिश्रियों की सोच कुछ अलग है, जो मनोवैज्ञानिक है. मन जाये तो यह एक बहुत ही अच्छी व्यवस्था थी, जो सिर्फ दिखावे के कारण बदल के रख दी गयी. इस तेरहवीं के पीछे की कहानी ऐसे है जो आपसे हमेशा छिपी हुई ही रही. जिन्हें जानकर आप भी बोलेंगें अच्छा तो इसलिए मनाई जाती थी तेरहवीं. बीएस समय के साथ हुए इन परिवर्तनों को फिर से बदल दिया जाये तो तेरहवीं का असली मतलब आपको समझ आ जायेगा.

क्या है तेरहवीं

त्रयोदशी पर यानी किसी भी व्यक्ति के मरणोपरांत तेरह दिन बाद तेरह ब्राम्हणों, और पूज्यजनों, रिश्तेदारों और समाज के लोगों को एक साथ भोजन कराया जाता है. इसे ही मृत्युभोज कहा जाने लगा है. यह इतना ज्यादा खर्च करने वाला हो गया है कि कई गरीब परिवारों के लिए समस्या का कारण बन जाती है. वे कर्ज तक में डूब जाते हैं. आज गरीबी इतनी ज्यादा बढ़ गयी है की किसी को भी समझ नहीं आता की हमारे यहाँ तो मौत हुई है की खर्चा आया है. फिर किसी तरह उधार या अपना जोड़ा हुआ पैसा निकल कर तेरहवीं मानते हैं.

तेरहवीं के लिए वैदिक व्यवस्था क्या थी ?

आपने देखा होगा की इंसान जब इस दुनिया में नहीं रहता तो मृतक के घर पर आज भी लोग कपड़े आदि लेकर जातेे हैं. पहले ऐसा नहीं था. आज सिर्फ कुछ ही ऐसे लोग होते हैं जो ये सब करते हैं पहले इसका दायरा काफी बड़ा था आपको जाने वाले, आपके रिश्तेदार, अपने अपने घरों से अनाज व कपडा राशन का सामान फल, सब्जियां, दूध, दही ,मिठाई आती सामान लेकर जाते थे तथा लोगों द्वारा लाई गई तरह-तरह खाद्य सामग्री ही बनाकर लोगों को खिलाई जाती थी.

इसे पहले  ब्राम्हणों को दिया जाता था और वे अपने हाथों से भोजन बनाते थे फिर उसको खाते थे. इसके बाद सबको भोज कराया जाता था. पर आज तो सिस्टम ही कुछ अलग हो गया है. अब तो कुछ बिलकुल ख़ास रिश्तेदार ही सिर्फ कपडे लेके जाये तो बड़ी बात है,बाकि तो बस युहीं गम बाँटने जाते हैं और खाना खाके जाते हैं.

क्यों मृत्यु वाले घर में रहते है रिश्तेदार

तेरहवीं तक आपने देख होगा की रिश्तेदार या करीबी आपके घरों में रहते हैं. किसी प्रियजन की मृत्यु से परिवार बेहद दु:खी रहता था. अपने किसी अपने की मृत्यु के दु:ख में कई बार परिवार के लोग बीमार व अशक्त तक हो जाते थे. सदमे में आत्मघाती कदम तक उठा लेते थे. ऐसा नहीं हो, वे सदमे में नहीं रहें इसलिए यह व्यवस्था राखी गई है कि खास परिचत और रिश्तेदार मृतक के परिजनों के पास ही रहेंगे. रोज उसके साथ सादा भोजन करेंगे. उसको सांत्वना देंगे जिससे उसका दु:ख व मन हलका हो जाए.

ब्राम्हणों को भोजन कराने का नियम क्यों?

तेरहवीं में विद्वानों या ब्राम्हणों को खिलाने का नियम है. इसके पीछे भी रहस्य है. ब्राम्हण वर्ग उस समय अधिक शिक्षित होता था. वह औषधीय हवन के साथ वेदोच्चार की तरंगों के घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रसार करता था. हवन उपचार के लिए इन्हें सदैव बुलाया जाता रहे, इसलिए इनके भोजन की व्यवस्था रख दी गई. तेरहवीं पर केवल गायत्री का जाप करने वाले यानी विद्वान और तपस्पी ब्राम्हणों को ही खिलाने का विधान है. ब्राम्हण कच्ची सामग्री यानी सीधा लेकर अपना भोजन खुद बनाते थे. महापात्र को दान के समय परिजनों को यह बताया जाता है कि हर व्यक्ति की मृत्यु निश्चित है. परिजन शोक में पड़कर कोई आत्मघाती कदम न उठाएं इसलिए महापात्र के माध्यम से एक लोकाचार निभाकर उसे जीवन की सच्चाई की सीख दी जाती थी.

आखिर ऐसा क्यों होता था

मृत्यु के बाद दिए जाने वाले भोज में मृतक के पूज्यजनों जैसे कि गुरु, वैद्य, दामाद, समधी, बेटी व अन्य आत्मीय जनों को ही पहले भोजन कराया जाता था. उन्हें यथा शक्ति स्मृति चिन्ह दिए जाते थे. इसके पीछे रहस्य यह था कि मृतक के दुनिया से चले जाने के बाद भी उसके संबंधियों का घर से नाता बना रहे. परिवार व रिश्तेदार एकजुट रहें

आज हमने ये सब रीति सोच को बदल के रख दिया है. तेरहवीं के नाम पर आज लाखों रुपए खर्च किए जाते हैं. जबकि पुराने समय में यह केवल राजा-महाराजाओं और सक्षम लोगों के द्वारा प्रजा के लिए किया जाता था. अब हर आदमी स्वयं को श्रेष्ठ मानने लगा है. मेरे पास भी पैसा है में कुछ भी करने में सक्षम हूँ. इस बात को ध्यान में रख अब सभी लोग इन बातों को भूल गए हैं. अब अन्य लोग अपने साथ ये सामान नहीं लेट बस आते हाई उल्टा खाना पीना खाके जाते हैं. यह अमीरों के लिए तो कोई फर्क नहीं पढता है पर गरीब ऐसे में क्या करें. हाँ पर कुछ जगह या गाँव में आज भी ये परम्परा निभाई जाती है और तेरहवीं को उसी ढंग से मनाया जाता है.

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