राम यहीं जन्में थे इसका सबूत दीजिए - मस्जिद के पक्षकारअयोध्या विवाद पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. मस्जिद के तरफदारो ने कहा कि भगवान राम के लाखों साल पहले अयोध्या में जन्म लेने का दावा किया जाता हैं. लेकिन वह विवादित जगह पर ही जन्मे थे, उसका क्या प्रमाण है?. मुस्लिम पक्षकारों की ओर से सीनियर एडवोकेट राजीव धवन की दलीलें सुनने के बाद चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस अब्दुल नजीर और जस्टिस अशोक भूषण की बेंच ने कहा कि मौजूदा टाइटल सूट पर फैसले से पहले वह तय करेंगे कि कोर्ट के 1994 के एक फैसले को संविधान पीठ के पास भेजने की जरूरत है या नहीं. इस मामले पर पुनर्विचार को लेकर धवन की दलीलें शुक्रवार को अधूरी रहीं. अगली सुनवाई अब 6 अप्रैल को होगी.

एक बार  मस्जिद बन गए तो तोड़ा नहीं जा सकता:-

सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने दलीलों की शुरुआत साल 1994 के मो. इस्माइल फारुखी केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले से की. यह मामला अयोध्या एक्ट, 1993 से जुड़ा हैं. धवन ने कहा कि मस्जिद अल्लाह की संपत्ति हैं. उसे तोड़ नहीं सकते. यह कह देना कि वहां (विवादित भूमि पर) मस्जिद नहीं थी, मायने नहीं रखता.

भारत में हिंदुओं के लिए धार्मिक लिहाज से कई अहम इमारतें हैं. मुस्लिमों के लिए कोई नहीं हैं. उन्होंने कहा कि 1994 का फैसला अनुच्छेद 25 के तहत मिले आस्था के अधिकार को कम करता है. कानून की सीमा में बंधकर आप मंदिर या मस्जिद नहीं तोड़ सकते.

उन्होंने कहा, ”1994 के फैसले में कहा गया है कि मुस्लिम कहीं भी नमाज पढ़ सकते हैं. जज का यह तर्क थोपा गया था. अगर मेरे लिए मस्जिद महत्वपूर्ण है तो आप मुझ पर उंगली नहीं उठा सकते. जज का यह कहना कि मस्जिद हमेशा मस्जिद नहीं रहती, गलत हैं.

सुप्रीम कोर्ट ने पहले के फैसले में क्या कहा था?

फैसले में कोर्ट ने कहा था “इस्लाम के लिए मस्जिद अनिवार्य नहीं हैं. मुस्लिम कही भी नमाज अदा कर सकते हैं. हालांकि, राम लला और निर्मोही अखाड़ा सहित मंदिर के अन्य पक्षकारों ने कहा कि 1994 के फैसले का मौजूदा मामले से कोई लेना-देना नहीं हैं.

प्रमुख बिंदु :-

  • एक बार मस्जिद बन जाए तो तोड़ा नहीं जा सकता.
  • सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था पहले के फैसले में.

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