एससी-एसटी एक्ट: अब केस दर्ज होने पर नहीं होगी तत्काल गिरफ्तारी, अग्रिम जमानत भी मिल सकेगी

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार काे एक याचिका पर सुनवाई करते हुए देशभर में एससी/एसटी एक्ट के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को स्वीकार करते हुए ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जिसके तहत कोर्ट ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम (एससी/एसटी एक्ट 1989) के तहत दर्ज मामलों में तत्काल गिरफ्तारी पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने फैसला देते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है और जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं है, उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से हो सकेगी। हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया गया है कि गिरफ्तारी की इजाजत लेने के लिए उसकी वजहों को रिकॉर्ड पर रखना होगा।

जातिसूचक शब्दों के इस्तेमाल से जुड़े मामलों का 2016 का आंकड़ा

अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति
गिरफ्तारी 10977 1326
चार्जशीट 10266 1131
दोषी करार 1247 66
बरी 6158 848
आरोपमुक्त 18 16
पेंडिंग मामले 41191 4571

किसने की मामले की सुनवाई?

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके गोयल और जस्टिस यूयू ललित की बेंच ने ऐसे मामलों में नए सिरे से गाइडलाइंस जारी की हैं। और ये नई व्यवस्था देशभर में आज से ही लागू हो जाएगी।

कोर्ट ने क्या कहा?

जस्टिस गोयल ने कहा कि वर्तमान समय में खुले मन से सोचने की जरूरत है। अगर किसी मामले में गिरफ्तारी के अगले दिन ही जमानत दी जा सकती है तो उसे अग्रिम जमानत क्यों नहीं दी जा सकती? उन्होंने फैसला सुनाते हुए देश की सभी निचली अदलतों के मजिस्ट्रेट को निर्देश जारी किए हैं। जिसके तहत उन्हें कहा गया है कि एससी/एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने के आरोपी को जब मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाए तो उस वक्त उन्हें आरोपी की हिरासत बढ़ाने का फैसला लेने से पहले गिरफ्तारी की वजहों की समीक्षा करनी चाहिए।

किस याचिका की सुनवाई के तहत दिया ये फैसला?

सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला पुणे के राजकीय फार्मेसी कॉलेज, कारद में पोस्टेड अफसर डाॅ. सुभाष काशीनाथ महाजन की याचिका का निपटारा करते हुए दिया है। महाजन पर काॅलेज के एक कर्मचारी ने केस किया था। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें राहत दे दी है।

क्या है कोर्ट की दी गई नई गाइडलाइंस?

1. ऐसे मामलों में निर्दोष लोगों को बचाने के लिए कोई भी शिकायत मिलने पर तुरंत मुकदमा दर्ज नहीं किया जाएगा। सबसे पहले शिकायत की जांच डीएसपी लेवल के पुलिस अफसर द्वारा शुरुआती जांच की जाएगी। यह जांच समयबद्ध होनी चाहिए। जांच किसी भी सूरत में 7 दिन से ज्यादा समय तक न हो। डीएसपी शुरुआती जांच कर नतीजा निकालेंगे कि शिकायत के मुताबिक क्या कोई मामला बनता है या फिर तरीके से झूठे आरोप लगाकर फंसाया जा रहा है?
2. ऐसे मामलों में तुरंत गिरफ्तारी नहीं की जाएगी। सरकारी कर्मचारियों की गिरफ्तारी सिर्फ सक्षम अथॉरिटी की इजाजत के बाद ही हो सकती है और जो लोग सरकारी कर्मचारी नहीं है, उनकी गिरफ्तारी एसएसपी की इजाजत से हो सकेगी। हालांकि, कोर्ट ने यह साफ किया गया है कि गिरफ्तारी की इजाजत लेने के लिए उसकी वजहों को रिकॉर्ड पर रखना होगा।
3. सुप्रीम कोर्ट ने इस अधिनियम के बड़े पैमाने पर गलत इस्तेमाल की बात को मानते हुए कहा कि इस मामले में सरकारी कर्मचारी अग्रिम जमानत के लिए आवेदन कर सकते हैं।
4. एससी/एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक शब्द इस्तेमाल करने के आरोपी को जब मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाए तो उस वक्त उन्हें आरोपी की हिरासत बढ़ाने का फैसला लेने से पहले गिरफ्तारी की वजहों की समीक्षा करनी चाहिए।
इ कोर्ट ने यह भी कहा कि इन दिशा. निर्देशों का उल्लंघन करने वाले अफसरों को विभागीय कार्रवाई के साथ अदालत की अवमानना की कार्रवाही का भी सामना करना होगा।

एससी/एसटी एक्ट के मामलों में अब तक क्या था प्रावधान?

दिल्ली हाईकोर्ट के वकील मनीष भदौरिया ने दैनिक भास्कर को एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज होने वाले मामलों में अभी तक अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को बताया। उन्होंने बताया कि.
1. एससी/एसटी एक्ट में जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल संबंधी शिकायत पर तुरंत मामला दर्ज होता था।
2. ऐसे मामलों में जांच केवल इंस्पेक्टर रैंक के पुलिस अफसर ही करते थे।
3. सरकारी कर्मचारी के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दायर करने से पहले जांच एजेंसी को कर्मचारी के विभागाध्यक्ष से इसकी इजाजत लेनी होती थी।
4. मामले में तुरंत गिरफ्तारी का भी प्रावधान था।
5. ऐसे मामलों में कोर्ट द्वारा अग्रिम जमानत नहीं दी जाती थी। नियमित जमानत केवल हाईकोर्ट के द्वारा ही दी जाती थी।
6. ऐसे मामलों की सुनवाई स्पेशल कोर्ट करती थी।

2016 में 935 शिकायतें झूठी पाई गई थी

नेशनल क्राइम रिकाॅर्ड ब्यूरो द्वारा 2016 में एससी/एसटी एक्ट के तहत जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने वाले लोगों के खिलाफ दर्ज मामलों को लेकर एक रिपोर्ट जारी की गई थी। रिपोर्ट बताती है कि देशभर में जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने के 11060 शिकायतों की जांच पुलिस ने की। इन शिकायतों में से 935 शिकायतें झूठी पाई गई थी।

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