शाम ढलने लगी और ये बेताबियाँ,

दिल में फिर तेरी यादें जगाने लगी,

बंद करके ये पलके भरी आह बस,

तेरी खुश्बू से आँखे नहाने लगी.

कई दिनों बाद सीढ़ी मैं छत की चढ़ी,

बेरुखी तेरी नीचे बुलाने लगी,

ये हवा भी कई दिन से मगरूर है,

जुल्फें जिस दिन से उनकी उड़ाने लगी …

शाम ढलने लगी और ये बेताबियाँ,

दिल में फिर तेरी यादें जगाने लगी ….

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