एक लोकप्रिय भारतीय त्यौहार है शिव रात्रि. शिवरात्रि त्यौहार फाल्गुन माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी पर मनाया जाता है. माना जाता है की इस दिन महादेव शंकर का पार्वती के साथ विवाह हुआ था. लेकिन इस त्यौहार के सम्बन्ध में और भी बहूत सी कथाये प्रचलीत है. हम इस लेख में उन्हें रुचिकर प्रचलीत कथाओं के बारे में जानेंगे.

शिव लिंग एक प्रकाश स्तंभ

कहा जाता है की एक बार भगवान् विष्णु और ब्रम्हा में बहस छिड़ गयी की हम दोनों में से श्रेष्ठ कौन है.  छोटा सा विवाद कुछ ही देर में बड़ा विवाद बन गया प्रचंड युद्ध शुरू हो गया चरों तरफ हाहाकार मच गया. अन्य देवता लोग घबरा गए. वे लोग दौड़े दौड़े भगवान् शंकर के पास पहुंचे.

भगवान् शिव उनके बीच आए और एक प्रकाश स्तम्भ का रूप धारण कर लिया. अब दोनों देवताओं में अपनी श्रेष्ठता दिखाने के लिए इस प्रकाश स्तम्भ के अन्तिम छोर को खोजने के लिए कहा गया. और कहा गया की जो इसका छोर पकड़ लेगा वो श्रेष्ठ माना जाएगा. फिर क्या था ब्रम्हा हंस का रूप धारण कर के स्तम्भ के ऊपर की ओर, एवं विष्णु प्रकाश स्तम्भ के नीचे की और छोर पाने के लिये चल पड़े.

हजारो मीलो की यात्रा तय करने के बाद भी दोनों को कोई छोर नहीं मिल पाया.  इस बीच ब्रम्हा को ऊपर से नीचे की और आते हूए केतकी का फूल मिला. ब्रम्हा के पूंछने पर केतकी के फूल ने बताया की मै अन्तिम छोर पर से उड़ कर आ रहा हूँ.  ब्रम्हा ने वंही अपनी यात्रा स्थागीत की और वापस चल पड़े.

उन्होने वापस आकर केतकी के फुल को सबूत के तौर पर दिखाया और बताया की मैं अन्तिम छोर से होकर आया हूँ.  और सबूत के तौर पर केतकी का फुल दिखा दिया. ब्रम्हा के इसी झूठ से शिव अत्याधिक क्रोधित हो गए, और श्राप दिया की हे ब्रम्हा आज के बाद किसी भी मंदिर में तुम्हारी पूजा नहीं होगी.

चुकीं इस घटना की रात कृष्ण पक्ष की फाल्गुन माह की चतुर्थी की रात थी तब से ही यह तिथि शिवरात्रि के रूप में मनाई जाती है. तब से ही शिव लिंग को प्रकाश स्तम्भ के रूप में पूजा जाता है. एवं इस तिथि को शिवरात्रि के रूप में मनाया जाता है.

अन्य कहानियाँ शिवरात्रि की

एक अन्य कहानी के अनुसार एक बार एक भील रास्ता भटक कर वन में भटक जाता है. रात्री में वह जंगली जानवरों के भय से एक बेल के पेड़ पर चढ़ जाता है. रात्रि में वह नींद के कारण और नीचे गिरने के डर से नींद को टालने के लिये पेड़ के पत्ते तोड़ तोड़ कर नीच डालता रहा.  साथ में शिव का नाम भी जोर जोर से ले रहा था. कहा जाता है कि उस पेड़ के ठीक नीचे एक शिवलिंग था, एवं अनभिज्ञता में वह उसी शिवलिंग पर बेल पत्री डालता रहा था.

अनभिज्ञता में किये गए उसके इस कृत्य पर भी शिव प्रसन्न हो गए और प्रकट हो कर उसे वरदान दिया.  कहते है की ये घटना फाल्गुन माह की कृष्णा पक्ष की चतुर्थी की थी. तब से ही इस दिन यहाँ त्यौहार मनाया जता है.

शिवरात्रि से जुड़ी इसी तरह की एक घटना समुद्र मंथन के समय की भी है. जब देवताओं को विष के प्रकोप से बचाने के लिये शिव ने स्वयं विष धारण कर लिया था.  जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया था.  तब सी ही शिव नीलकंठ कहलाने लगे.

शिवरात्रि के त्यौहार से प्रेरणाए

कहानियाँ अनेको है, पर हमें इस त्यौहार के पीछे छुपे हुवे सन्देश पर जाना चाहिए. सब से पहले की जाड़े के ठिठुराने वाली ठण्ड से हमें निकाल कर, मनोहारी बसंत ऋतू में प्रवेश की याद दिलाता है. चारों तरफ खिली हल्की धूप, फूलों से लहलाते पेड़ो की लताये हमें प्रफुल्लित करती है. इस त्यौहार के बहाने जन सामान्य अपने दैनिक जीवन से निकल कर कुछ समय अध्यात्म के लिये निकालता है. और आगे के समय के लिए खुद को ताजगी, स्फूर्ति, और ईश्वरीय विशवास से भर लेता है.

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