श्री राम हो या फिर गंगा मैया – कोई तो कर्ज उतारो भैया

तुम आए थे हाथ “मिटाने”, मीठी बातों के फूल लिए,

जो वृक्ष लदे थे पुष्पों से, उनके झूठे शूल लिए,

हमने आस – कपास बुना के, तुमको शीर्ष बिठाया है,

उस पद की न सीमा वर्णों, जो हमने ही दिलवाया है,

पीछे जरा पलट के देखो, कोरे पन्ने उलट के देखो,

सरयू माता के राज दुलारे, खड़े है प्यारे राम हमारे,

तुमने हमको वचन दिया था, मंदिर बनने का सपन दिया था,

अब चरण से लेकर सर तक “तुम हो”, ये मिल के हमने जतन किया था,

अब कहते हो नियमों ने रोका, कब तक हमको दोगे धोखा,

एक मौका है मान लो प्यारे, नही छोड़ेगे राम हमारे,

उनके नाम का धंधा करके, सुग्रिवों से वचन हैं हारे,

रामचरित मानस को देखो, राम लखन की नस नस देखो,

धोखा बाली का सहा नहीं, रावण अभिमानी रहा नहीं,

हम तुम हैं एक त्रण से ओछे, वो त्रिकाल ऊँगली पे रोके,

समय है आतम साध करो, गंगा मैया को याद करो,

उनके आँचल की मिटटी को, धोने का वचन भी याद करो,

तुम किस मुंह से वापस आओगे, क्या हमसे नज़र मिलाओगे,

क्यों गंगा मैली है अब तक, श्री राम को क्या बतलाओगे,

20 हजार करोड़ का नाटक, गंदे किनारे, रोड का नाटक,

क्या सच है क्या वहम हमारा, कैसे तुम समझाओगे,

तुम्हे पता था संविधान है, रोकेगा ये एक विधान है,

लोक सभा रोने आते हो, क्या राज्य सभा सोने जाते हो?

कोई गरज घोषणा कागज से, क्या कभी जमींन पर लाते हो?

अब आज विचार कर सोना तुम, कौन खेवेगा 19 की नैया

लाचारी के सूट छोड़ दो, धोखे के बूट उतारो भैया,

श्री राम हो या फिर गंगा मैया, कोई तो कर्ज उतारो भैया

कोई तो कर्ज उतारो भैया… कोई तो कर्ज उतारो भैया…

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