पगड़ी आन, बान और शान का प्रतीक मानी जाती है. यह प्राचीन सभ्यता और संस्कृति की परिचायक है. संस्कृत में पगड़ी को शिरोस्त्राण या शिरोवेश कहा जाता है. राजा, महाराजा, ठाकुरों और नवाबों की पगडिय़ों की विशिष्ट शैली रही है. वहीं, किसान, व्यापारी, पुजारी और चरवाहे की भी पगड़ी की बनावट अलग होती थी.

सिक्खों की पगड़ी

सिक्खों की पगड़ी भी उनकी पृथक पहचान है. बिना पगड़ी के यदि सामने कोई आ जाए तो ये कहना मुश्किल होगा कि वो सिक्ख है या नहीं, कहने का तात्पर्य सिर्फ इतना है अपनी पहचान बनाये रखना बहुत महत्वपूर्ण है. अपनी जाति पर गर्व करते हुए अपनी पगड़ी धारण करते हैं. पगड़ी उनकी पहचान का एक हिस्सा है. इसी कारण से विभिन्न रंगों, बाँधने के तरीकों को सभी समुदाय बचपन से सीखना शुरू कर देते हैं. हर एक व्यक्ति अपनी पगड़ी स्वयं बांधता है और इसमें शान महसूस करता है. पगड़ी उनकी सम्मान की प्रतीक है.

सिखों के अनुसार

पगड़ी हमारे गुरु का उपहार है. हमारे लिए यह हम खुद को गर्भ महसूस करने का तरीका है. जहाँ हम अपने आप को किसी से कम नहीं समझते हैं. ये हमारे लिए किसी बादशाह के ताज से कम नहीं है. पुरुषों और महिलाओं के समान, इस प्रोजेक्टिव पहचान के लिए रॉयल्टी, अनुग्रह और विशिष्टता व्यक्त की जाती है यह दूसरों के लिए एक संकेत है कि हम अनंत के रूप में रहते हैं और सभी की सेवा करने के लिए समर्पित हैं. पगड़ी पूर्ण प्रतिबद्धता को छोड़कर कुछ भी प्रतिनिधित्व नहीं करता है. जब आप अपना पगड़ी बांधकर बाहर खड़ा होना चुनते हैं, तो आप निर्भयतापूर्वक खड़े होते हैं क्योंकि छह अरब लोगों से आप अलग खड़े एक व्यक्ति हैं. यह एक सबसे उत्कृष्ट कार्य है.

पगड़ी एक कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है यह व्यक्ति का स्वयं का मुकुट है. चेहरे पर बाल सजावट नहीं है यह अनंत मूरत की स्वीकृति है, अनन्तता की छवि में रहते हैं. गुरु गोबिंद सिंह ने कहा, “जब तक आप ‘नारी’ विशेष रूप से अनन्य होंगे, तब तक मैं आपको ब्रह्मांड के सभी प्रकाश दे दूँगा”. एक महान शिक्षक बनने का मतलब सबसे सही शिष्य होना है, सबसे उत्तम छात्र. और अपने गुरु ग्रन्थ साहेब के शिष्य हैं.

यह अनुमान लगाया जाता है कि आप परमेश्वर के पुत्र हैं. आपकी दाढ़ी है और आपकी पगड़ी है और आप सबको  दिखते हैं  लोग बहुत जल्द निराश हो जाते हैं. इसलिए स्थिति यह मांग करती है कि आप इस निराशा से दूर रहें खुद को सबसे अच्छा समझे. सिख कुछ भी नहीं है लेकिन पहचान है. पहचान के बिना कोई सिख नहीं है सिख वास्तविकता की पहचान के अलावा कुछ भी नहीं है, इसके बिना, कोई भी सिख धर्म का नहीं है. अतः सिख की पहचान उसकी पगड़ी से है.

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