ये कविता एक ऐसे समय की है जब एक “विशेष” लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आगे बढ़ रही निश्छल, पवित्र और निष्कलंक लड़की एक साथी को अपना मन सौंप देती है, और वो साथी इस लड़की को उसके लक्ष्य की तरफ देखने को कहता है, लेकिन वो लड़की भावनाओ के समंदर में उतर चुकी होती है, और कोई तर्क उसे समझ नही आ रहा होता है, चलिए शामिल होते हैं उन दो समर्पित मन की कोमल भावनाओं में…

 

सूखी एक बंज़र जमी ने जो पुकारा मुझे,

मुड़कर देखा मैंने एक इंसान को,

बेरंग थी आँखे होंठ सूखे हाथ मुरझाये,

सोचा दो भिगोये भाव दे दूँ सूखी जान को,

जैसे उन भावों ने छुआ है मन सरिता का,

चंचल हिलोरे चली हिरनी की चाल को,

मैं तो एक राहगीर रास्ता मेरा जुदा है,

मेरे साथ कहाँ चल पड़ी मेरी राह में,

लेके चल मुझे किसी राह पे भले ही कहीं,

मंजिल है मेरी हर पल ही निगाह में,

रास्ते की हरियाली रंगीन नज़ारे देखे,

उसने तो राह को ही मंजिल समझ लिया,

रंगों में छुपा है सच झूठ सब हरियाली,

पतझड़ देख खुद फूलों ने समझ लिया,

ये तो एक फूल है जो पल में ओझल हुआ,

रूप निखरा सही ये आँखे तो बोझल है,

भाव इस मन के पल में जिए मरेंगे,

हाथ मत सौप इसे उढ़ता बादल है,

हर एक अवधि का अंत तो होना यहाँ,

फिर क्यों ताके रोज उगते सूरज को…

 

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here