तूं आजा माहि खेल जा दिल से होली

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जस्वातों के समंदर में हसरतों की लहरें उठना लाज़मी है,

ये लहरें किनारों के लबों को चूम तो सकती हैं,

बशर्ते वक्त की हवाओं का साथ मिलता रहे.

कोई साथ न भी मिले तो राह में ज़माने के रूखे,

कटीले और बेरहम चट्टानों से भरे उतार चड़ाव न मिले,

तो भी मिलन हो सके…

वो कहीं है और उसकी तड़प कही सिसक रही है,

वो सांसे ले रहा है कहीं और,

और उसकी धड़कन कहीं और गिनी जा रही है,

यही आलम इस मोहोब्बत के मुहल्ले में हर शाम हो जाता है,

कोई हाल पूछे न पूछे चेहरा लाल हो जाता है.

अकेले में किसी के आने की आहट सुनना

और चौंक कर दरवाजे पर भागना,

वैसें तो इसे पागलपन कहते हैं

पर मुहोब्बत की निशानियों में एक ये भी शामिल है.

मौसम में ठंडक किसी हसीना के कन्धों पर,

दुपट्टे की तरह चढ़ रही है, उतर रही है.

इस मौसम में जरा सी ठंडक,

किसी की नर्म बाँहों में सिमट जाने के लिए उकसाती है.

फिर जब आंख खुलती है,

तो हाथों में तकिया देख के आह गहरी हो जाती है,

ठंडी तो रात भर से होती है….

चारों तरफ बिखरे पड़े हैं अरमानो के रंग

और चाहतों की गुलाल,

बस देर है तुम्हारे आने की,

तुम आजाओ और छु लो इन्हें मखमली उँगलियों से,

फिर ये फिजां में फ़ैला दो,

और मेरे उदास आशियाने,

के उतरे हुए चेहरे पर नर्म हथेली रख दो,

मैं जाग जाऊं तमन्ना मचल जाए,

तुम्हे कस लूँ बाँहों में,

चादर में सिमट जाए,

सांसे जगह मांगे निकलने के लिए,

और धड़कन पैरों पर उछल जाए,

पर तुझे न खबर लगे,

और मुझे न पता लगे….

गर हो जाए यहीं आखरी अफसाना,

हो जाए ये किस्सा तमाम,

कोई गम नही होगा मुझे,

सारी उम्र जी कर भी क्या पाउँगा,

आखिर, सुकून तो तेरा आगोश में ही ले पाउँगा…

फिर कोई आहट जुदा कर देती है,

इस रूहानी ख्याल से,

दोस्तों की गालियां सुनाई दे रही हैं,

की चल गुलाल लाते हैं दुकान से,

आज सूखे रंग और गुलाल से मिल लेते हैं,

जब तुम आओगे फिर कोई होली मनाएगे,

जहाँ रंग होगे हसरतों के,

गुलाल सीद्दत की होगी,

गाल तुम्हारे होंगे और उँगलियाँ,

मेरी चाहत की होगी….

 

लगा लूँगा सीने से जैसे लबों से लग जाए बोली,

तू आजा माहि… खेल जा दिल से होली.

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