हो शाम यहीं रुक जाया करो,

उस पार न अब तुम जाया करो,

रौनक तो तुमसे होती है,

उस पार तो दीप न ज्योति है,

न राहें ज़ाहिर, न साथी है,

उम्मीदे भी तो आधी हैं,

अब आश न कोई बुझाया करो,

उस पार न अब तुम जाया करो…

 

तुम रेतो की गलियां चलती हो,

मैं निशान तुम्हारे देखता हूँ,

तुम ताज़ी कलियाँ चुनती हो,

मैं काँटे चुभन देखता हूँ,

तुम साडी से पैर छुपाती हो,

मैं उसके पार देखता हूँ,

अब और न कुछ छुपाया करो,

उस पार न अब तुम जाया करो…

 

जो छिलन तुम्हारे मन पे है,

वही तो मेरे मन पे है,

भीतर बाहर के कारण सब,

टकराते हैं सीने में जब,

ये पलके बहुत बोलती हैं,

राज छुपे सब खोलती हैं,

खुद के भी तो सिलता हूँ,

कुछ घाव यहीं रख जाया करो,

उस पार न अब तुम जाया करो…

हो शाम यहीं रुक जाया करो,

उस पार न अब तुम जाया करो…

 

 

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